Bal Vatikas : बाल वाटिकाओं का शुभारंभ : उत्साह के बाद लापरवाही का दौर, एजुकेटर भर्ती ठप और शिक्षा का संकट

Bal Vatikas : उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘बाल वाटिका’ के तहत प्री-स्कूल शिक्षा को मजबूत करने का सपना अब जिला स्तर पर हकीकत से टकरा रहा है। 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जिले में तमाम बाल वाटिकाओं का शुभारंभ धूमधाम से किया गया था, लेकिन अब लगभग तीन महीने बाद स्थिति बेहद निराशाजनक हो चुकी है। बजट जारी होने के बावजूद एजुकेटरों की भर्ती प्रक्रिया ठप पड़ी है, पढ़ाई-लिखाई और खेलकूद गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं, और बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों की लापरवाही से अभिभावकों व बच्चों का भविष्य दांव पर लटक गया है। आज बाल दिवस के अवसर पर भी विभाग की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, जिससे सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह योजना कागजों तक सीमित रह जाएगी?

बाल वाटिकाओं में क्या हो रहा है? – पढ़ाई का नामोनिशान नहीं, सिर्फ खानापूर्ति

बाल वाटिकाओं का उद्देश्य 3 से 6 वर्ष के बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा, खेलकूद और रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से तैयार करना है। लेकिन जिले में इन केंद्रों की स्थिति खराब बनी हुई है। उत्तर प्रदेश सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुरूप यहां नियमित पढ़ाई-लिखाई, कहानी सुनाना, गतिविधि-आधारित शिक्षा और खेलकूद का आयोजन होना चाहिए। दुर्भाग्य से, अधिकांश बाल वाटिकाओं में न तो योग्य एजुकेटर हैं और न ही कोई संरचित कार्यक्रम। बच्चे मात्र उपस्थिति दर्ज कराने आते हैं, जबकि वास्तविक शिक्षा का अभाव है। अभिभावक शिकायत कर रहे हैं कि बिना प्रशिक्षित स्टाफ के ये केंद्र महज ‘बच्चों की रखवाली’ का स्थान बनकर रह गए हैं। विभागीय सूत्रों के अनुसार, 210 एजुकेटरों की रिक्तियां भरी जाने की प्रक्रिया में देरी से पूरी योजना प्रभावित हो रही है। नतीजतन, बच्चों का मानसिक और शारीरिक विकास रुक गया है, जो बाल दिवस जैसे अवसर पर और भी चिंताजनक है।

शिक्षक और शिक्षामित्रों की तैनाती: अस्थायी समाधान या मजबूरी?

बाल वाटिकाओं में एजुकेटरों की कमी को दूर करने के लिए बेसिक शिक्षा विभाग ने एक अस्थायी उपाय अपनाया है। विभाग के आदेशानुसार, प्रत्येक बाल वाटिका में एक शिक्षक (प्राइमरी स्कूल से) और एक शिक्षामित्र (मिड-डे मील वितरण करने वाले सहायक) को अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई है। इनका मुख्य कार्य बच्चों को बुनियादी पढ़ाई, खेलकूद और दैनिक गतिविधियों में संलग्न रखना है। हालांकि, यह व्यवस्था महज खानापूर्ति साबित हो रही है। शिक्षक और शिक्षामित्र मूल रूप से प्राइमरी शिक्षा या सहायक भूमिकाओं के लिए प्रशिक्षित हैं, न कि प्री-स्कूल स्तर की विशेष आवश्यकताओं के लिए। नतीजतन, बच्चों को उचित मार्गदर्शन नहीं मिल पा रहा। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि यह ‘आपातकालीन’ व्यवस्था है, लेकिन स्थायी समाधान के रूप में एजुकेटर भर्ती की प्रक्रिया को तेज करने का कोई संकेत नहीं मिल रहा। अभिभावक संगठनों ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा है कि बिना विशेषज्ञों के यह योजना विफल हो जाएगी।

15 अगस्त के शुभारंभ में कितने अधिकारियों ने भाग लिया? – आमंत्रण तो भेजे, लेकिन उपस्थिति निराशाजनक

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर बाल वाटिकाओं का शुभारंभ एक ऐतिहासिक कदम माना गया था। जिला प्रशासन ने तमाम वरिष्ठ अधिकारियों को आमंत्रित किया था, लेकिन हकीकत में उपस्थिति बेहद कम रही। सूत्रों के अनुसार, कुल 50 से अधिक अधिकारियों को न्योता दिया गया था, लेकिन मात्र 8-10 ही पहुंचे। जिला मजिस्ट्रेट, मुख्य शिक्षा अधिकारी और कुछ ब्लॉक स्तरीय अधिकारी उपस्थित थे, जबकि बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) समेत कई वरिष्ठ पदाधिकारी अनुपस्थित रहे। इसकी वजहें विभागीय व्यस्तता बताई गईं, लेकिन स्थानीय लोगों का मानना है कि यह योजना के प्रति उदासीनता का प्रतीक है। शुभारंभ समारोह में रिबन काटने और भाषणों तक तो सब कुछ ठीक चला, लेकिन उसके बाद फॉलो-अप की कमी ने पूरी कोशिश को धक्का पहुंचा दिया।

14 नवंबर को बाल दिवस पर कितने अधिकारी बाल वाटिकाओं पर पहुंचे? – फिर वही पुरानी कहानी

आज बाल दिवस (14 नवंबर) के अवसर पर विभाग ने बाल वाटिकाओं और आंगनबाड़ी केंद्रों के लिए 1500 रुपये प्रति केंद्र का विशेष बजट जारी किया। यह राशि खेल सामग्री, शिक्षण साधनों और उत्सव कार्यक्रमों के लिए निर्धारित है। लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति वैसी ही रही। जिले की 200 से अधिक बाल वाटिकाओं में से अधिकांश पर कोई उच्च अधिकारी नहीं पहुंचा। मात्र 4-5 ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (बीईओ) और स्थानीय प्रभारी ही दिखाई दिए, जबकि बीएसए या जिला स्तर के अधिकारी अनुपस्थित रहे। बच्चों के लिए आयोजित कार्यक्रमों में भी उत्साह की कमी रही – कुछ केंद्रों पर मिठाई बांटी गई, लेकिन शिक्षा और खेल पर कोई फोकस नहीं। अभिभावकों ने सोशल मीडिया पर शिकायत की कि बजट तो आ गया, लेकिन इसका सही उपयोग कौन करेगा? विभाग का दावा है कि यह बजट ‘स्थानीय स्तर पर’ खर्च होगा, लेकिन पारदर्शिता की कमी से संदेह बढ़ रहा है।

210 एजुकेटर भर्ती में बीएसए की डीलिंग: किस सर्विस प्रोवाइडर से हो रही बातचीत?

बाल वाटिकाओं की सबसे बड़ी समस्या एजुकेटरों की कमी है। जिले में 210 पद रिक्त हैं, जिनकी भर्ती प्रक्रिया बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) के नेतृत्व में चल रही है। लेकिन प्रक्रिया में देरी से ‘सांप सूंघ गया’ जैसी स्थिति बन गई है। विभागीय दस्तावेजों के अनुसार, बीएसए इस भर्ती के लिए ‘एक्सेस लर्निंग सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड’ नामक सर्विस प्रोवाइडर से डीलिंग कर रहे हैं। यह कंपनी एजुकेटरों की स्क्रीनिंग, ट्रेनिंग और नियुक्ति प्रक्रिया को संभालने का जिम्मा लेगी। हालांकि, अनुबंध की शर्तों, टेंडर प्रक्रिया और समयसीमा पर पारदर्शिता न होने से विवाद बढ़ रहा है। स्थानीय शिक्षक संघों का आरोप है कि यह डीलिंग राजनीतिक दबाव में हो रही है, जिससे योग्य उम्मीदवारों को नुकसान हो रहा। बीएसए ने स्पष्ट किया है कि प्रक्रिया जल्द पूरी होगी, लेकिन कोई समयसीमा नहीं बताई।

विभाग पर सवाल: लापरवाही का अंत कब?

बेसिक शिक्षा विभाग की इस लापरवाही से न केवल बाल वाटिका योजना प्रभावित हो रही है, बल्कि समग्र शिक्षा प्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। 15 अगस्त के शुभारंभ से लेकर 14 नवंबर तक कोई सुधार न होने से अभिभावक आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शीघ्र एजुकेटर भर्ती पूरी न हुई, तो यह योजना ‘फेलियर’ की श्रेणी में आ जाएगी। विभाग से मांग की जा रही है कि बीएसए पर कार्रवाई हो और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जाए। बाल दिवस पर बच्चों का भविष्य चमकाने का वादा अब हकीकत बने, इसके लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है।

Other Latest News

Leave a Comment