Ranchi : रांची के प्रेस क्लब में मंगलवार को बृहद झारखंड कुड़मी समन्वय समिति की ओर से एक अहम प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया। प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए समिति के मुख्य संयोजक सह समाज के अगुआ शीतल ओहदार ने कहा कि कुड़मी जनजाति को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने और कुड़माली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज कराने की मांग को लेकर कुड़मी/कुरमी समाज पिछले 75 वर्षों से लगातार आंदोलनरत है। उन्होंने कहा कि यह संघर्ष वर्ष 1950 से ही संवैधानिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए चल रहा है, लेकिन अब तक समाज को न्याय नहीं मिल पाया है।
शीतल ओहदार ने बताया कि 20 सितंबर को झारखंड में अपनी संवैधानिक मांगों को लेकर ऐतिहासिक “रेल टेका आंदोलन” किया गया था। उस दौरान केंद्र सरकार द्वारा आश्वासन दिए जाने के बाद आंदोलन को स्थगित कराया गया, लेकिन इसके बाद सैकड़ों आंदोलनकारियों पर मुकदमे दर्ज कर दिए गए, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि इससे समाज में गहरा आक्रोश और असंतोष व्याप्त है।

आंदोलन को और तेज करते हुए समिति ने आगामी 22 फरवरी 2026 को रांची के प्रभात तारा मैदान, एचईसी में कुड़मी/कुरमी अधिकार महारैली आयोजित करने की घोषणा की है। इस महारैली में लगभग पांच लाख कुड़मी समाज के लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ शामिल होंगे और अपने अधिकारों की आवाज बुलंद करेंगे।
वहीं शीतल ओहदार ने झारखंड सरकार द्वारा पेसा कानून को कैबिनेट से पारित किए जाने का स्वागत किया, लेकिन साथ ही चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि कुड़मी समाज की पारंपरिक रूढ़ी प्रथा, जिसे ‘बाईसी प्रथा’ कहा जाता है, को पेसा कानून में शामिल किया जाना अनिवार्य है। यदि बाईसी प्रथा को शामिल नहीं किया गया, तो झारखंड की बड़ी आबादी वाला कुड़मी समाज पेसा कानून के तहत मिलने वाले अधिकारों से वंचित रह जाएगा। ऐसी स्थिति में बृहद झारखंड कुड़मी समन्वय समिति को मजबूरन व्यापक और उग्र आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा।
प्रेस वार्ता में सखीचंद महतो, रचिया महतो, कुमेश्वर महतो, सुषमा देवी, दानिसिंह महतो, अधिवक्ता मिथलेश महतो, राजेश महतो, प्रदीप महतो, संदीप महतो, कंचन रानी, किरण महतो, सुमन महतो और रबिता महतो सहित कई समाज के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।










