Chausath Devi Mandir : होली के बाद काशी में निभती है अनोखी परंपरा, एक चुटकी गुलाल से मांगी जाती है देवी की कृपा

Chausath Devi Mandir : वाराणसी के चौसट्ठी देवी मंदिर में होली के बाद धूलिवंदन पर विशेष परंपरा निभाई जाती है। श्रद्धालु देवी को एक चुटकी गुलाल अर्पित कर भय, बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति की कामना करते हैं।

Chausath Devi Mandir : वाराणसी की होली केवल रंग-गुलाल और फाग गीतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी कई सदियों पुरानी धार्मिक परंपराएं भी आज तक जीवित हैं। ऐसी ही एक अनोखी परंपरा है चौसट्ठी देवी मंदिर (Chausath Devi Mandir) की, जहां होली के अगले दिन धूलिवंदन के अवसर पर भक्त देवी के चरणों में गुलाल अर्पित करते हैं। माना जाता है कि इस दिन देवी को एक चुटकी गुलाल चढ़ाने से जीवन के भय, बाधाएं और तांत्रिक कष्ट दूर हो जाते हैं।

बंगाली टोला की गलियों में उमड़ती है आस्था

काशी के बंगाली टोला की संकरी गलियों में स्थित यह प्राचीन मंदिर होली के बाद विशेष रूप से जीवंत हो उठता है। सुबह से ही श्रद्धालु यहां पहुंचने लगते हैं और मंदिर परिसर में अबीर-गुलाल की खुशबू फैल जाती है। भक्त देवी के चरणों में गुलाल चढ़ाकर सुख-समृद्धि और सुरक्षा की कामना करते हैं।
स्थानीय लोगों का मानना है कि इस परंपरा को निभाए बिना काशी की होली अधूरी मानी जाती है।

पौराणिक मान्यता से जुड़ी है चौसट्ठी योगिनियों की कथा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवी चौसट्ठी का संबंध चौंसठ योगिनियों से बताया जाता है। कहा जाता है कि भगवान शिव की जटाओं के प्रहार से इन योगिनियों का प्राकट्य हुआ था। देवी को तंत्र साधना से भी जोड़ा जाता है, इसलिए यहां पूजा करने से तांत्रिक बाधाओं के शमन की मान्यता प्रचलित है।
मंदिर में देवी की प्रतिमा के साथ काल भैरव और एकदंत विनायक की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं, जो इस स्थान की आध्यात्मिक महत्ता को और बढ़ाती हैं।

सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवित

इतिहासकारों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार चौसट्ठी देवी की यह परंपरा लगभग 500 वर्षों से अधिक पुरानी मानी जाती है। बताया जाता है कि 18वीं सदी तक इस सिद्धपीठ का वैभव बेहद समृद्ध था।
उस समय शहर ही नहीं बल्कि आसपास के गांवों से भी लोग ढोल-नगाड़ों और गाजे-बाजे के साथ चौसट्ठी देवी के दर्शन के लिए आते थे। धूलिवंदन के दिन यहां मेले जैसा माहौल बन जाता था और मंदिर परिसर रंगों से भर जाता था।

चौसट्ठी यात्रा का भी रहा खास महत्व

पुराने समय में काशी में “चौसट्ठी यात्रा” की भी परंपरा थी। होली के दिन श्रद्धालुओं के समूह शहर के विभिन्न हिस्सों से निकलकर चौसट्ठी देवी के मंदिर तक पहुंचते थे।
इस यात्रा की खास बातें थीं:

  • भक्तों का समूह में मंदिर तक पहुंचना
  • रास्ते भर फाग गीत और ढोल की थाप
  • देवी को गुलाल अर्पित कर यात्रा का समापन

हालांकि समय के साथ यह यात्रा कम हो गई, लेकिन मंदिर में गुलाल चढ़ाने की परंपरा आज भी जारी है।

एक चुटकी गुलाल से मांगी जाती है कृपा

धूलिवंदन के दिन भक्त चौसट्ठी देवी के चरणों में सिर्फ एक चुटकी गुलाल चढ़ाते हैं। माना जाता है कि यह छोटी-सी भेंट भी देवी को प्रसन्न करने के लिए पर्याप्त होती है।
स्थानीय श्रद्धालुओं के अनुसार:

  • देवी की पूजा से भय और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है
  • घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है
  • जीवन की बाधाएं दूर होती हैं

इसी विश्वास के कारण हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं।

काशी की धरोहर बनी यह परंपरा

वाराणसी की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान में चौसट्ठी देवी मंदिर की यह परंपरा आज भी खास स्थान रखती है। होली के रंगों के बीच आस्था का यह स्वरूप काशी की आध्यात्मिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है।
धूलिवंदन के दिन बंगाली टोला से लेकर चौसट्ठी घाट तक की गलियां गुलाल से रंग जाती हैं और भक्त देवी के चरणों में श्रद्धा की एक चुटकी अर्पित कर खुद को धन्य मानते हैं।

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