Arun Govil Career After Ramayan: अरुण गोविल का नाम सुनते ही ज्यादातर लोगों के दिमाग में सीधे भगवान राम की तस्वीर उभर आती है। 1987 में दूरदर्शन पर प्रसारित हुए रामानंद सागर के धारावाहिक ‘रामायण’ ने उन्हें रातोंरात घर-घर में मशहूर कर दिया। लेकिन इस भूमिका ने उन्हें जहां एक तरफ अपार सम्मान और प्यार दिया, वहीं दूसरी तरफ उनके एक्टर के करियर को इतना बड़ा झटका दिया कि वे कई सालों तक मुख्यधारा की फिल्मों से दूर रह गए।
अरुण गोविल का जन्म 12 जनवरी 1952 को हुआ था। उन्होंने अपना करियर हिंदी फिल्मों से शुरू किया। 1970 के दशक में उन्होंने ‘पहेली’, ‘सावन को आने दो’ और ‘सांच को आंच नहीं’ जैसी फिल्मों में काम किया। लेकिन उस समय उनकी पहचान ज्यादा मजबूत नहीं थी। वे एक सामान्य हीरो के तौर पर काम कर रहे थे। फिर 1985 में रामानंद सागर ने उन्हें ‘विक्रम और बेताल’ में राजा विक्रमादित्य का रोल दिया। यहीं से उनकी किस्मत बदली। रामानंद सागर को उनकी एक्टिंग इतनी पसंद आई कि उन्होंने उन्हें ‘रामायण’ में भगवान राम का किरदार सौंप दिया।

रामायण का जादू और लोगों का प्यार
‘रामायण’ का पहला एपिसोड 25 जनवरी 1987 को आया और यह धारावाहिक 1988 तक चला। उस समय टीवी पर इतना बड़ा शो नहीं था। पूरा देश रविवार सुबह रामायण देखने के लिए रुक जाता था। अरुण गोविल ने राम के किरदार को इतनी सादगी, शांति और गरिमा से निभाया कि लोग उन्हें देखकर प्रणाम करने लगे। सड़क पर जाते हुए लोग उनके पैर छूते, आशीर्वाद मांगते और उन्हें ‘भगवान’ कहकर पुकारते। यह सम्मान किसी एक्टर को शायद ही कभी मिला हो।
अरुण गोविल खुद कहते हैं कि इस रोल ने उन्हें बहुत सम्मान दिया। लोग उन्हें भगवान की तरह देखने लगे। लेकिन इसी इमेज ने उनके करियर में सबसे बड़ी समस्या खड़ी कर दी।
भगवान वाली इमेज बनी सबसे बड़ी मुश्किल
रामायण खत्म होने के बाद अरुण गोविल ने सोचा कि अब वे वापस फिल्मों में काम करेंगे। लेकिन प्रोड्यूसर और डायरेक्टर उन्हें देखकर कहते, आपकी राम वाली इमेज इतनी मजबूत हो गई है कि हम आपको कोई दूसरा रोल कैसे दें? उनका कहना है कि किसी रोमांटिक हीरो या विलेन का किरदार अरुण गोविंद को मिला तो दर्शन स्वीकार कभी नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें वह सिर्फ राम के रूप में देखतेर हैं
अरुण गोविल ने एक इंटरव्यू में बताया, “रामायण ने मुझे बहुत प्यार और सम्मान दिया, लेकिन इससे मेरा करियर मुख्यधारा की फिल्मों से पूरी तरह दूर हो गया। प्रोड्यूसर कहते थे कि आप राम हैं, आपको हम क्या रोल दें? कमर्शियल फिल्मों में फिट नहीं लगते।” इस वजह से वे कई सालों तक बड़े प्रोजेक्ट्स से दूर रहे। उन्हें लगता था कि अगर वे यह रोल नहीं करते तो शायद उनका जीवन अधूरा रह जाता, लेकिन साथ ही यह रोल उनके लिए सबसे बड़ा चैलेंज भी बन गया।
क्या किया अरुण गोविल ने इसके बाद?
रामायण के बाद अरुण गोविल ने कुछ टीवी सीरियल किए, जैसे ‘विश्वामित्र’ में हरिश्चंद्र और ‘बुद्ध’ में बुद्ध का रोल। उन्होंने कुछ एनिमेटेड फिल्म में भी राम की आवाज दी। लेकिन बॉलीवुड में वे वापस नहीं लौट पाए। वे कहते हैं कि वे इस बात से खुश हैं कि लोगों ने उन्हें इतना प्यार दिया, लेकिन एक एक्टर के तौर पर उन्हें विविध रोल करने का मौका कम मिला।
कई बार राजनीति में भी आने के ऑफर आए। राजीव गांधी ने उन्हें उपचुनाव में उतरने को कहा था, लेकिन अरुण ने मना कर दिया क्योंकि वे शूटिंग में व्यस्त थे। बाद में भी कई राजनीतिक ऑफर आए, लेकिन वे नहीं गए। उनका मानना है कि वे राजनीति के लिए नहीं बने।
निष्कर्ष
आज अरुण गोविल 70 साल के पार हैं। वे अभी भी लोगों के बीच सम्मानित हैं। राम मंदिर के उद्घाटन जैसे मौकों पर उन्हें खास तौर पर बुलाया जाता है। लेकिन उनका करियर देखकर एक बात साफ है – कभी-कभी एक रोल इतना बड़ा हो जाता है कि वह एक्टर की पूरी पहचान बन जाता है। अच्छे अर्थों में भी और मुश्किलों में भी।










