Iran War : मध्य पूर्व में ईरान से जुड़े बढ़ते तनाव और समुद्री मार्गों पर संभावित खतरे ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल मचा दी है। खासतौर पर Strait of Hormuz को लेकर आशंकाएं तेज हैं। यह संकरा समुद्री रास्ता खाड़ी देशों के तेल को दुनिया तक पहुंचाने का प्रमुख माध्यम है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर यहां अवरोध हुआ तो भारत पर कितना असर पड़ेगा? फिलहाल स्थिति यह बताती है कि भारत अल्पकालिक संकट से निपटने की स्थिति में है।
40–45 दिनों का कच्चे तेल का भंडार

ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, भारत के पास करीब 40 से 45 दिनों की जरूरत पूरी करने लायक कच्चे तेल का भंडार उपलब्ध है। कुल मिलाकर लगभग 10 करोड़ बैरल तेल विभिन्न रूपों में सुरक्षित है। इसमें शामिल हैं:
- रिफाइनरियों में रखा व्यावसायिक स्टॉक
- भूमिगत रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR)
- भारत की ओर आ रहे तेल टैंकर
यह भंडारण व्यवस्था किसी भी अचानक आपूर्ति बाधा की स्थिति में राहत देने के लिए तैयार रखी गई है।
आयात पर निर्भरता और हॉर्मूज की अहमियत
भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इसमें से आधे से अधिक हिस्से की आपूर्ति पश्चिम एशिया से होती है। प्रतिदिन करीब 50 लाख बैरल तेल देश में आयात होता है, जिसमें लगभग 25 लाख बैरल सीधे हॉर्मूज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है।
यही कारण है कि Iran से जुड़ी किसी भी सैन्य या राजनीतिक हलचल का असर भारत जैसे बड़े उपभोक्ता देश पर नजर आता है।
कीमतों में उछाल, बाजार में बेचैनी
तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में साफ दिख रहा है। वैश्विक मानक Brent Crude की कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। यह हालिया स्तर से करीब 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि हालात लंबे समय तक तनावपूर्ण बने रहे, तो भारत का आयात बिल बढ़ सकता है। साथ ही पेट्रोल-डीजल की घरेलू कीमतों पर भी दबाव बन सकता है।
संकट लंबा चला तो चुनौती बढ़ेगी
ऊर्जा विश्लेषकों के मुताबिक, मौजूदा भंडार अल्पकालिक राहत तो दे सकता है, लेकिन यदि समुद्री मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है तो आपूर्ति और लागत दोनों पर असर होगा। तेल की भौतिक कमी से ज्यादा चिंता कीमतों में उतार-चढ़ाव को लेकर है, क्योंकि इससे महंगाई और व्यापार संतुलन प्रभावित हो सकता है।
वैकल्पिक स्रोतों पर भारत की रणनीति
सरकार और तेल कंपनियां संभावित संकट से निपटने के लिए पहले से तैयारी में हैं। जरूरत पड़ने पर भारत निम्न क्षेत्रों से अतिरिक्त तेल खरीद सकता है:
- पश्चिम अफ्रीका
- लैटिन अमेरिका
- अमेरिका
- रूस
इस तरह आपूर्ति के विविधीकरण की रणनीति से किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम की जा सकती है।
क्यों अहम है हॉर्मूज जलडमरूमध्य
करीब 33 किलोमीटर चौड़ा यह समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। इसके अलावा वैश्विक गैस आपूर्ति का भी बड़ा भाग इसी पर निर्भर है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार की अस्थिरता पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार को प्रभावित करती है।
निष्कर्ष: फिलहाल स्थिति नियंत्रण में
मौजूदा हालात में भारत के पास पर्याप्त भंडार और वैकल्पिक विकल्प मौजूद हैं। तात्कालिक संकट की आशंका कम है, लेकिन अगर तनाव लंबा खिंचता है तो आयात लागत और महंगाई पर असर संभव है। सरकार की रणनीति फिलहाल आपूर्ति सुनिश्चित रखने और बाजार में स्थिरता बनाए रखने पर केंद्रित है।










