Last Maharani Of Darbhanga Kamasundari Devi: दरभंगा राजघराने की आखिरी महारानी कामसुंदरी देवी का निधन, एक युग का अंत

Last Maharani Of Darbhanga Kamasundari Devi: मिथिला में शोक की लहर, 96 साल की उम्र में ली अंतिम सांस

Last Maharani Of Darbhanga Kamasundari Devi: बिहार के दरभंगा में 11 जनवरी 2026 को एक ऐसा दुखद दिन था, जब दरभंगा राजघराने की आखिरी महारानी कामसुंदरी देवी ने 96 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया। पिछले कई महीनों से वो बीमार चल रही थीं और दरभंगा के राज परिसर में स्थित कल्याणी निवास में ही अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर फैलते ही पूरे मिथिला क्षेत्र और बिहार में शोक की लहर दौड़ गई। लोग उन्हें याद करते हुए कह रहे हैं कि एक पूरा युग खत्म हो गया है।

महारानी कामसुंदरी देवी महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी और आखिरी पत्नी थीं। महाराजा कामेश्वर सिंह दरभंगा रियासत के अंतिम शासक थे, जिनका निधन 1962 में हुआ था। उनकी पहली पत्नी महारानी राजलक्ष्मी का देहांत 1976 में हुआ, जबकि दूसरी पत्नी महारानी कामेश्वरी प्रिया 1940 में ही चल बसी थीं। महारानी कामसुंदरी देवी का विवाह महाराजा से 1940 के दशक में हुआ था। राजघराने में कोई संतान नहीं थी, इसलिए महारानी को राज परिवार की वरिष्ठतम और आखिरी जीवित सदस्य माना जाता था।

महाराजा की याद में बनाई 15,000 किताबों वाली लाइब्रेरी

महारानी कामसुंदरी देवी का सबसे बड़ा योगदान उनकी सांस्कृतिक विरासत को बचाने का काम रहा। महाराजा कामेश्वर सिंह के निधन के बाद उन्होंने उनकी स्मृति में ‘महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन’ की स्थापना की। यह फाउंडेशन 1989 में शुरू हुआ था, लेकिन इसकी जड़ें महाराजा के समय से जुड़ी हैं। फाउंडेशन के जरिए उन्होंने महाराजा की निजी लाइब्रेरी को संरक्षित किया, जिसमें 15,000 से ज्यादा किताबें, दुर्लभ पांडुलिपियां, संस्कृत ग्रंथ, पुरानी तस्वीरें, ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स और यहां तक कि 1930-1948 के बीच के वायसराय और गवर्नरों की यात्राओं की फिल्में शामिल हैं।

यह लाइब्रेरी सिर्फ किताबों का संग्रह नहीं है, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत हिस्सा है। इसमें मैथिली साहित्य, इतिहास, कला और पुरानी परंपराओं से जुड़ी सामग्री है। महारानी ने इसे आम लोगों और विद्वानों के लिए खोल दिया ताकि आने वाली पीढ़ियां मिथिला की समृद्ध संस्कृति से जुड़ सकें। फाउंडेशन आज भी दरभंगा में कल्याणी निवास में स्थित है और दुनिया भर के शोधकर्ता यहां आते हैं। महारानी ने अपनी सादगी और समर्पण से इस विरासत को जिंदा रखा, भले ही समय के साथ राजघराने की संपत्ति में काफी कमी आ गई हो।

राजसी वैभव से सादगी तक का सफर

दरभंगा राज का इतिहास बहुत पुराना है। यह 16वीं सदी में महेश ठाकुर से शुरू हुआ था और ब्रिटिश काल में यह भारत की सबसे बड़ी जमींदारियों में से एक था। महाराजा कामेश्वर सिंह के समय में राज परिवार ने शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक कार्यों में बड़ा योगदान दिया। लेकिन आजादी के बाद जमींदारी खत्म होने से संपत्ति का बड़ा हिस्सा सरकार को चला गया। महारानी कामसुंदरी देवी ने मुश्किल हालात में भी परिवार की इज्जत और विरासत को बचाए रखा।

वे बहुत सादगी से रहती थीं। राजसी ठाठ-बाट के बावजूद उनकी जिंदगी सरल थी। पिछले कुछ सालों में स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण वे बिस्तर पर ही रहती थीं। उनके निधन पर बिहार के कई नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और आम लोग शोक जता रहे हैं। युवराज कपिलेश्वर सिंह जैसे परिवार के सदस्यों ने कहा कि यह अपूरणीय क्षति है। उनका अंतिम संस्कार दरभंगा राज परिसर में पारंपरिक तरीके से किया गया।

एक युग का अंत, लेकिन विरासत जिंदा

महारानी कामसुंदरी देवी का जाना दरभंगा राजघराने के लिए एक बड़ा झटका है। वे आखिरी कड़ी थीं जो सीधे महाराजा के समय से जुड़ी हुई थीं। लेकिन उनकी छोड़ी हुई लाइब्रेरी और फाउंडेशन आज भी मिथिला की संस्कृति को जीवित रखे हुए हैं। 15,000 किताबों वाला यह संग्रह न सिर्फ ज्ञान का खजाना है, बल्कि एक याद है कि कैसे एक महिला ने अपने पति की स्मृति में इतनी बड़ी धरोहर बचाई।

Other Latest News

Leave a Comment