Satna Jail Superintendent Leena Kosta : मध्य प्रदेश के सतना जेल में आज एक ऐसी महिला की कमान है, जिन्होंने न सिर्फ अपने सपनों को नए रंग दिए, बल्कि हजारों कैदियों की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव लाकर समाज सेवा का नया उदाहरण पेश किया है। जी हां, हम बात कर रहे हैं सतना केंद्रीय जेल की अधीक्षक श्रीमती लीना कोष्टा की। उनका जीवन संघर्ष, हिम्मत और समर्पण की मिसाल है। जहां ज्यादातर युवा सुरक्षित नौकरी की तलाश में रहते हैं, वहीं लीना कोष्टा ने जेल जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में कदम रखकर साबित किया कि अगर इरादे मजबूत हों तो कोई भी राह मुश्किल नहीं रहती।
डॉक्टर बनने का अधूरा सपना और आर्थिक मजबूरियां

जबलपुर की मूल निवासी लीना कोष्टा का बचपन से सपना था कि वे डॉक्टर बनें और समाज की सेवा करें। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय से उन्होंने बीएससी (बायोलॉजी) की डिग्री हासिल की। लेकिन आर्थिक परिस्थितियों ने उनके इस सपने पर पानी फेर दिया। डॉक्टरी की पढ़ाई महंगी थी और परिवार की स्थिति इसे पूरा नहीं कर पाई। हार नहीं मानी लीना ने। उन्होंने एमए की डिग्री ली और फिर जेल विभाग में वेलफेयर ऑफिसर के पद के लिए आवेदन किया।
परिवार में कई सदस्यों ने इस फैसले का विरोध किया। वे नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी अपराधियों के बीच काम करे। लेकिन लीना की मां ने उनका हौसला बढ़ाया। मां ने न सिर्फ उनका साथ दिया, बल्कि इंटरव्यू तक पहुंचाने में मदद की। लीना कहती हैं, “मां के बुलंद हौसले ने मुझे कभी पीछे नहीं हटने दिया।”
1998 से शुरू हुआ जेल विभाग में करियर का सफर
साल 1998 में लीना को नर्सिंगपुर जिले में वेलफेयर ऑफिसर के रूप में पहली पोस्टिंग मिली। यहां से उनका संघर्ष भरा सफर शुरू हुआ। उन्होंने 11 साल तक सागर जेल में सेवाएं दीं। इसके बाद सतना में भी एक साल वेलफेयर ऑफिसर के तौर पर काम किया। साल 2011 में प्रमोशन मिला और वे भोपाल जेल मुख्यालय में चीफ प्रोविजन ऑफिसर बनीं।
लगातार मेहनत, समर्पण और ईमानदारी के बल पर 2015 में उन्हें जेल अधीक्षक का पद मिला। पहली पोस्टिंग विदिशा जेल में हुई, जहां उन्होंने तीन साल तक सराहनीय कार्य किया। 2018 से 2022 तक कटनी जेल की अधीक्षक रहीं। वर्तमान में वे सतना केंद्रीय जेल की जिम्मेदारी संभाल रही हैं।
कैदियों के लिए ‘मां’ जैसा सम्मान
लीना कोष्टा का सबसे बड़ा गुण उनकी संवेदनशीलता है। वे कहती हैं कि कैदी उन्हें सिर्फ अधिकारी की नजर से नहीं देखते, बल्कि मां की तरह सम्मान देते हैं। यह रिश्ता उन्हें सबसे ज्यादा प्रेरित करता है। सतना जेल में उन्होंने धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत की। ये आयोजन कैदियों के मनोबल को बढ़ाते हैं और उनके अंदर नई ऊर्जा भरते हैं।
उद्योगों और कृषि से आत्मनिर्भरता की मिसाल
सतना जेल 57 एकड़ में फैली है। यहां तीन बड़े उद्योग चल रहे हैं – कारपेंट्री, बुनाई और पावर लूम। कैदी यहां फर्नीचर, चादरें, खिलौने, मूर्तियां और पूजा सामग्री बनाते हैं। इन उत्पादों की बिक्री के लिए जेल कैंटीन के पास एक आउटलेट भी खोला गया है, जहां आम नागरिक इन्हें खरीद सकते हैं।
लीना कोष्टा ने जेल परिसर की 15-20 एकड़ जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराकर कृषि योग्य बनाया। बंदियों की मेहनत से बंजर भूमि उपजाऊ बनी और एक वर्ष में 12-13 लाख रुपये का राजस्व अर्जित हुआ। यह काम कैदियों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ जेल की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है।
परिवार और जिम्मेदारियों का संतुलन
जेल की जिम्मेदारियां इतनी भारी हैं कि कई बार त्योहारों और पारिवारिक आयोजनों में शामिल नहीं हो पातीं। लेकिन उनका परिवार हमेशा सहयोगी रहा। लीना की एक बेटी है। वे चाहे कितनी भी देर से घर लौटें, खुद खाना बनाती हैं और मां व गृहिणी की भूमिका पूरी निभाती हैं।
महिला सशक्तिकरण की जीती-जागती मिसाल
लीना कोष्टा का जीवन साबित करता है कि महिला किसी भी क्षेत्र में कदम रखकर चुनौतियों का सामना कर सकती है। जेल अधीक्षक के रूप में उनका सफर सिर्फ प्रशासनिक सफलता नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण का प्रतीक है। उनका मानना है कि अपराधियों को सिर्फ दंड देना ही उद्देश्य नहीं, उन्हें सही राह पर लाना भी उतना ही जरूरी है।










