Chandausi : रमजान का आखिरी अशरा शुरू: शबे कद्र की तलाश में इबादत में जुटे रोजेदार, जानिए क्यों खास हैं ये रातें

Chandausi : 21वीं रात से एहतकाफ का सिलसिला शुरू, मस्जिदों और घरों में खास इबादत का माहौल

Chandausi : चंदौसी में रमजान उल मुबारक का तीसरा और आखिरी अशरा शुरू हो चुका है, जिसे इस्लामी मान्यताओं में जहन्नम की आग से निजात दिलाने वाला माना जाता है। इस दौरान रोजेदार ज्यादा से ज्यादा इबादत कर अल्लाह की रहमत और मगफिरत हासिल करने की कोशिश करते हैं। मस्जिदों में नमाज, तिलावत और दुआओं का माहौल दिखाई देने लगा है।

धार्मिक जानकार बताते हैं कि रमजान के इस आखिरी हिस्से में बंदों को अपने गुनाहों की माफी मांगने और ज्यादा से ज्यादा इबादत करने का मौका मिलता है। इसलिए मुसलमान इस समय को बेहद कीमती मानते हैं और दिन-रात इबादत में मशगूल रहते हैं।

21वीं रात से एहतकाफ की शुरुआत

रमजान के आखिरी अशरे की 21वीं रात से कई लोग मस्जिदों में एहतकाफ में बैठते हैं। एहतकाफ का मतलब होता है कि कोई शख्स दुनिया की तमाम व्यस्तताओं से दूर रहकर मस्जिद में इबादत के लिए खुद को समर्पित कर देता है।

इस दौरान एहतकाफ में बैठे लोग ज्यादातर वक्त नमाज, कुरान की तिलावत और जिक्र में बिताते हैं। उनका मकसद अल्लाह की रजा हासिल करना और अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने की दुआ करना होता है।

शबे कद्र की रात सबसे अफजल

इस्लामी मान्यताओं के अनुसार रमजान के आखिरी दस दिनों में एक खास रात आती है जिसे शबे कद्र कहा जाता है। कुरान शरीफ में भी इस रात की खास अहमियत बताई गई है। माना जाता है कि इसी रात कुरान पाक को लौह-ए-महफूज से आसमानी दुनिया पर उतारा गया था।

हदीसों में बताया गया है कि शबे कद्र की एक रात की इबादत हजार महीनों की इबादत से भी ज्यादा अफजल मानी जाती है। यही वजह है कि मुसलमान इस रात को पाने की कोशिश में खास इबादत करते हैं।

इन रातों में की जाती है शबे कद्र की तलाश

धार्मिक विद्वानों के मुताबिक शबे कद्र की निश्चित तारीख नहीं बताई गई है, लेकिन हदीसों में इसे रमजान की विषम (Odd) रातों में तलाशने की सलाह दी गई है।

इन रातों में खास इबादत की जाती है:

  • 21वीं रात
  • 23वीं रात
  • 25वीं रात
  • 27वीं रात
  • 29वीं रात

इन रातों में मुसलमान मस्जिदों और घरों में नमाज, कुरान की तिलावत और दुआ में मशगूल रहते हैं।

इबादत और दुआ की खास अहमियत

इस मुबारक मौके पर लोग अपने लिए ही नहीं बल्कि पूरे समाज और मुल्क में अमन-चैन की दुआ करते हैं। बुजुर्गों का कहना है कि जो शख्स शबे कद्र की रात को सच्चे दिल से इबादत में गुजारता है, उसे 83 साल से ज्यादा इबादत का सवाब मिलता है।

इसी वजह से आखिरी अशरे में मस्जिदों में रौनक बढ़ जाती है और लोग ज्यादा से ज्यादा वक्त इबादत में बिताने की कोशिश करते हैं।

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