Varanasi : वाराणसी में इस बार होली का रंग कुछ अलग ही नजर आया। गुलाल और डीजे की धुनों से दूर, गुरुधाम पार्क का माहौल हरिनाम संकीर्तन और पुष्पों की खुशबू से महक उठा। इस्कॉन वाराणसी की ओर से आयोजित “फूलों की होली-भजन क्लबिंग” कार्यक्रम में हजारों युवाओं की भागीदारी ने इसे खास बना दिया। अनुमानित पांच हजार से अधिक लोग इस आयोजन में शामिल हुए और देर शाम तक पार्क भक्ति रस में डूबा रहा।
1100 किलो फूलों से विशेष अभिषेक

कार्यक्रम की शुरुआत भगवान के विशेष अभिषेक से हुई। आयोजकों के अनुसार लगभग 1,100 किलोग्राम पुष्पों और 20 प्रकार के पवित्र द्रव्यों से विधिवत पूजा-अर्चना की गई। पूरे प्रांगण में गेंदा, गुलाब और अन्य सुगंधित फूलों की वर्षा होती रही।
अभिषेक के बाद जब फूलों की होली शुरू हुई तो दृश्य अद्भुत था—
- चारों ओर पुष्पों की वर्षा
- भक्तों के मुख से गूंजता हरिनाम
- वातावरण में शंख और मृदंग की ध्वनि
इस अनूठे आयोजन ने उपस्थित लोगों को आध्यात्मिक आनंद से भर दिया।
‘भजन क्लबिंग’ में झूमे युवा
कार्यक्रम का सबसे आकर्षक हिस्सा रहा नामारस बैंड का संकीर्तन। पारंपरिक कीर्तन को आधुनिक संगीत शैली के साथ प्रस्तुत किया गया, जिसे ‘भजन क्लबिंग’ नाम दिया गया। युवाओं ने पूरे उत्साह से भक्ति गीतों पर नृत्य किया।
यहां न कोई डीजे का शोर था और न ही रासायनिक रंगों की बौछार, बल्कि हर ताल पर ‘हरे कृष्ण’ का उच्चारण गूंज रहा था। युवाओं का कहना था कि इस तरह की होली उन्हें सुकून और सकारात्मक ऊर्जा देती है।
नशामुक्त और पर्यावरण अनुकूल पहल
आयोजकों ने स्पष्ट किया कि इस आयोजन का उद्देश्य होली को उसकी मूल आध्यात्मिक परंपरा से जोड़ना है। आधुनिक दौर में जहां त्योहारों में नशे और हानिकारक रंगों का प्रयोग बढ़ रहा है, वहीं इस्कॉन की यह पहल एक सकारात्मक संदेश देती है।
कार्यक्रम की खास बातें:
- पूरी तरह नशामुक्त आयोजन
- केवल प्राकृतिक फूलों का उपयोग
- प्लास्टिक और रासायनिक रंगों से परहेज
- श्रद्धालुओं के लिए दिनभर निःशुल्क सात्विक प्रसाद
इस पहल को युवाओं और परिवारों दोनों ने सराहा।
भक्ति, संस्कृति और युवा ऊर्जा का संगम
गुरुधाम पार्क का नजारा देर शाम तक भक्तिमय बना रहा। हरिनाम संकीर्तन, पुष्पवर्षा और प्रसाद वितरण के बीच श्रद्धालु भाव-विभोर दिखाई दिए। कई युवाओं ने इसे ‘यादगार होली’ बताया।
आयोजकों का कहना है कि आने वाले वर्षों में भी इस परंपरा को और भव्य रूप दिया जाएगा, ताकि होली का संदेश प्रेम, सौहार्द और आध्यात्मिकता के साथ समाज तक पहुंचे।
काशी में मनाई गई यह फूलों की होली इस बात का प्रमाण है कि त्योहार सिर्फ रंगों से नहीं, बल्कि संस्कारों और श्रद्धा से भी मनाए जा सकते हैं।










