Aravalli Order Stayed by Supreme Court: अरावली (Aravalli) पर्वत श्रृंखला को लेकर जारी विवाद में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने बड़ा और अहम हस्तक्षेप किया है। 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली न मानने वाले आदेश पर शीर्ष अदालत ने फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने इस मामले में न सिर्फ गंभीर सवाल उठाए, बल्कि एक हाई-पावर्ड कमेटी के गठन का भी आदेश दिया है। यह फैसला पर्यावरण संरक्षण, खनन गतिविधियों और सरकारी नीतियों के बीच संतुलन को लेकर बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि कई तकनीकी और वैज्ञानिक पहलुओं को स्पष्ट किया जाना अभी बाकी है। आखिर क्यों अदालत को खुद संज्ञान लेना पड़ा, समिति की भूमिका क्या होगी और आगे क्या फैसला आ सकता है चलिए जानते हैं…
100 मीटर ऊंचाई वाला आदेश क्यों बना मुद्दा/Aravalli Order Stayed by Supreme Court
अरावली (Aravalli) पर्वत श्रृंखला की परिभाषा को लेकर विवाद उस समय गहराया, जब 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा न मानने का आदेश सामने आया। इस परिभाषा के लागू होने से राजस्थान (Rajasthan), हरियाणा (Haryana), गुजरात (Gujarat) और दिल्ली (Delhi) के बड़े हिस्सों में खनन और अन्य गतिविधियों को मंजूरी मिलने की आशंका जताई गई। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली सिर्फ ऊंचाई का नाम नहीं, बल्कि एक प्राचीन और संवेदनशील इको-सिस्टम है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लेते हुए कहा कि यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि पर्यावरणीय भविष्य से जुड़ा हुआ है। इसी पृष्ठभूमि में अदालत ने इस आदेश पर अंतरिम रोक लगाने का फैसला किया।

आदेश पर स्टे और समिति का गठन
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Solicitor General Tushar Mehta) ने अदालत में पक्ष रखा और कहा कि इस मामले में कई गलत जानकारियां फैलाई जा रही हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कई तकनीकी पहलुओं को साफ करने की जरूरत है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत (CJI Suryakant) की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि अरावली हिल्स और पूरी रेंज की स्ट्रक्चरल और इकोलॉजिकल इंटीग्रिटी की गहन जांच जरूरी है। इसी उद्देश्य से एक हाई-पावर्ड कमेटी गठित की गई है, जिसमें डोमेन एक्सपर्ट्स शामिल होंगे। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि समिति की सिफारिशों और अंतिम फैसले तक मौजूदा आदेश पर रोक रहेगी।
किन मुद्दों पर होगी गहन पड़ताल
सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल एनवायरनमेंट मिनिस्ट्री (Central Environment Ministry) की उस परिभाषा को भी फिलहाल रोक दिया है, जिसे 20 नवंबर को स्वीकार किया गया था। उस फैसले में 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा नहीं माना गया था। अदालत का मानना है कि इस परिभाषा से बड़े पैमाने पर रेगुलेटेड माइनिंग की राह खुल सकती है, जिससे पर्यावरण को गंभीर नुकसान हो सकता है। नई एक्सपर्ट कमेटी यह जांच करेगी कि अरावली की भौगोलिक, संरचनात्मक और पर्यावरणीय पहचान क्या है और उसे कैसे संरक्षित किया जाना चाहिए। यह समिति वैज्ञानिक तथ्यों, ऐतिहासिक रिकॉर्ड और पर्यावरणीय प्रभावों का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपेगी।
केंद्र और राज्यों को नोटिस, 21 जनवरी को सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार के साथ-साथ चार अरावली राज्यों—राजस्थान (Rajasthan), गुजरात (Gujarat), दिल्ली (Delhi) और हरियाणा (Haryana)—को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अरावली पर्वत श्रृंखला इन्हीं राज्यों में फैली हुई है, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा राजस्थान में स्थित है। हालांकि अरावली हिमालय जितनी ऊंची नहीं है, लेकिन यह जैव-विविधता, वन्य जीव और जल संरक्षण के लिहाज से बेहद अहम मानी जाती है। अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 21 जनवरी की तारीख तय की है। तब तक सभी पक्षों की प्रतिक्रियाएं और समिति की प्रारंभिक दिशा इस मामले की आगे की दिशा तय करेगी।










