Annual Exams Preparation: रायबरेली जिले में बेसिक शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली इन दिनों लोगों के सवालों के घेरे में है। एक तरफ 16 मार्च से सभी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में वार्षिक परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं, वहीं दूसरी तरफ विभाग ने परीक्षा से ठीक पहले शिक्षकों को पांच दिन की ट्रेनिंग और छात्रों को जिला स्तर की खेल प्रतियोगिता में लगा दिया है। इससे छात्रों की पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी पर बड़ा असर पड़ रहा है। शिक्षक और अभिभावक दोनों ही इस व्यवस्था से नाराज हैं और कह रहे हैं कि विभाग की असली चिंता पढ़ाई नहीं, बल्कि वित्तीय साल खत्म होने से पहले बजट खर्च करना लगता है।
वार्षिक परीक्षाएं 16 मार्च यानी सोमवार से शुरू हो रही हैं। हर साल इस समय स्कूलों में खास तैयारियां होती हैं। शिक्षकों को उत्तर पुस्तिकाएं (जांचने वाली कॉपियां) इकट्ठा करनी होती हैं, परीक्षा कक्षों में सीटिंग व्यवस्था करनी पड़ती है, रोल नंबर चिपकाने होते हैं और कई अन्य छोटे-मोटे काम पूरे करने होते हैं। ये सब काम समय पर नहीं हुए तो परीक्षा का माहौल बिगड़ सकता है और छात्रों को परेशानी हो सकती है। लेकिन इस बार शिक्षकों को इन तैयारियों के लिए मुश्किल से समय मिल पा रहा है।

5 दिन की ट्रेनिंग ने शिक्षकों का समय ले लिया/Annual Exams Preparation
जानकारी के मुताबिक, ब्लॉक संसाधन केंद्र (बीआरसी) पर 10 मार्च से 14 मार्च तक पूरे पांच दिन का शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाया गया। ये ट्रेनिंग सुबह से शाम तक चलती रही, जिससे शिक्षक स्कूल नहीं जा पाए। 15 मार्च रविवार था, यानी अवकाश। ऐसे में शिक्षकों को परीक्षा की तैयारियां करने के लिए स्कूल में सिर्फ एक भी दिन नहीं मिला। अब सवाल यह है कि बिना ठीक से तैयारी के परीक्षा कैसे संचालित होगी? क्या उत्तर पुस्तिकाएं सही से व्यवस्थित होंगी? क्या सीटिंग प्लान बन पाएगा? ये सब चीजें शिक्षकों के बिना मुश्किल हैं।
एक शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “ये स्थिति बिल्कुल हास्यास्पद है। जब हमें स्कूल में रहकर परीक्षा की तैयारियां करनी चाहिए थीं, तब हमें बीआरसी पर ट्रेनिंग में बैठा दिया गया। विभाग को परीक्षा की तारीखें पहले से पता थीं, फिर ट्रेनिंग इसी समय क्यों रखी गई? अगर पहले रख देते तो कोई दिक्कत नहीं होती।”
खेल प्रतियोगिता ने छात्रों की परीक्षा तैयारी प्रभावित की
इसी बीच विभाग ने 14 मार्च को जिला स्तर पर ‘पीएम श्री’ विद्यालयों की खेल प्रतियोगिता भी आयोजित कर दी। ये प्रतियोगिता बेसिक शिक्षा अधिकारी राहुल सिंह और जिला व्यायाम शिक्षक शोएब हसन खान के नेतृत्व में हुई। इसमें शामिल छात्र पूरे दिन खेल के मैदान में व्यस्त रहे। सुबह से शाम तक दौड़, कूद, खो-खो जैसे खेल खेले गए। अब सोचिए, जो बच्चा 14 मार्च की शाम तक खेल में थका-मांदा होगा, वो 16 मार्च को परीक्षा देने कैसे जाएगा? उसका दिमाग शांत कैसे रहेगा? पढ़ाई का रिवीजन कैसे होगा? कई अभिभावकों का कहना है कि बच्चे घर आकर थकान से सो गए होंगे, परीक्षा की तैयारी कहां से करेंगे?
शिक्षा से जुड़े जानकारों का मानना है कि ये सब कार्यक्रम वित्तीय वर्ष (फाइनेंशियल ईयर) खत्म होने से पहले बजट खर्च करने की जल्दबाजी में किए जा रहे हैं। मार्च महीना आते ही विभागों में बजट बचाने या खर्च करने का दबाव बढ़ जाता है। अगर बजट बचा रह गया तो अगले साल उतना फंड नहीं मिलता। इसलिए अधिकारियों की प्राथमिकता पढ़ाई या परीक्षा नहीं, बल्कि बजट समय पर खर्च करना बन गया है। ट्रेनिंग और खेल प्रतियोगिता जैसे कार्यक्रमों में फंड खर्च होता है, इसलिए इन्हें इसी समय में ठूंसा जा रहा है।
शिक्षकों और अभिभावकों में बढ़ रहा असंतोष
जिले के शिक्षकों और अभिभावकों में इस पूरे मामले को लेकर गुस्सा और निराशा है। कई अभिभावक कह रहे हैं कि बच्चे साल भर पढ़ते हैं, लेकिन आखिरी समय में ऐसे कार्यक्रम क्यों? एक अभिभावक ने कहा, “हमारे बच्चे परीक्षा की तैयारी कर रहे थे, लेकिन खेल में भेज दिया गया। अब अगर नंबर कम आएं तो जिम्मेदार कौन होगा?”
शिक्षकों का भी यही कहना है कि विभाग की ये कार्यप्रणाली सुधारने की जरूरत है। अगर ट्रेनिंग जरूरी थी तो परीक्षा के बाद रखी जा सकती थी। खेल प्रतियोगिता भी किसी दूसरे समय में हो सकती थी। लेकिन बजट खर्च का दबाव इतना है कि समय का ध्यान नहीं रखा जाता।
परीक्षा के परिणाम पर असर पड़ सकता है
इस सारी अव्यवस्था के बीच होने वाली वार्षिक परीक्षाओं के नतीजे कितने सही और सार्थक होंगे? क्या छात्र अच्छे नंबर ला पाएंगे? या फिर ये सब कार्यक्रम छात्रों के भविष्य पर बोझ बन जाएंगे? विभाग को चाहिए कि आगे से ऐसी गलतियां न दोहराए। परीक्षा से पहले पढ़ाई और तैयारी को प्राथमिकता दी जाए, बजट खर्च को नहीं।










