Charan Hembram Padma shri 2026: ओडिशा के संताली लेखक चरण हेम्ब्रम को पद्म श्री, साओताली भाषा के लिए जीवनभर की मेहनत का सम्मान

Charan Hembram Padma shri 2026: संताली भाषा के योद्धा चरण हेम्ब्रम को मिलेगा पद्म श्री, अलचिकी लिपि और साहित्य में अनमोल योगदान

Charan Hembram Padma shri 2026: ओडिशा के मयूरभंज जिले में रायरंगपुर के पास एक छोटे से गांव से निकले चरण हेम्ब्रम को अब देश का बड़ा सम्मान मिलने जा रहा है। राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी नोटिफिकेशन के अनुसार, संताली (साओताली) भाषा और साहित्य में उनके जीवनभर के योगदान के लिए उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया जाएगा। यह खबर 2026 में आई है और जैसे ही यह सुचना पहुंची, रायरंगपुर और आसपास के इलाकों में खुशी का माहौल छा गया। लोग घर-घर जाकर बधाई दे रहे हैं, क्योंकि चरण हेम्ब्रम सिर्फ एक लेखक नहीं, बल्कि संताली संस्कृति के एक बड़े संरक्षक और प्रचारक हैं।

1952 से शुरू हुआ सफर,गांव से निकले एक समर्पित योद्धा/Charan Hembram Padma shri 2026

चरण हेम्ब्रम का जन्म 1952 में मयूरभंज जिले के रायरंगपुर के लुलाघाट क्षेत्र के नावा गारा गांव में एक संताली परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्हें पढ़ाई-लिखाई और अपनी भाषा-संस्कृति से गहरा लगाव था। 1971 में मैट्रिक पास करने के बाद उन्होंने टीचर ट्रेनिंग ली और शिक्षक बन गए। लेकिन उनका असली मिशन संताली भाषा को मजबूत करने का था। उस समय संताली भाषा को ज्यादा मान्यता नहीं मिली थी, और अलचिकी लिपि (ओल चिकी) का इस्तेमाल भी सीमित था। चरण हेम्ब्रम ने इसे बदलने का फैसला किया।

वे विभिन्न जगहों पर ट्रेनिंग लेते रहे और असिका सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़ गए। असिका में उन्होंने महासचिव और आजीवन सदस्य जैसे महत्वपूर्ण पद संभाले। वहां से उन्होंने आदिवासी भाषा, संस्कृति और शिक्षा के विकास के लिए लगातार काम किया। स्कूलों, समितियों और संस्थाओं में अलचिकी लिपि पढ़ाने का काम शुरू किया और इसे दूर-दूर तक फैलाया। वे नियमित यात्राएं करते थे, गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करते थे।

अलचिकी लिपि और संताली साहित्य की लोकप्रियता

चरण हेम्ब्रम का सबसे बड़ा योगदान संताली भाषा की अलचिकी लिपि को लोकप्रिय बनाने में है। उन्होंने कई किताबें, पुस्तिकाएं और पत्रिकाएं लिखीं और प्रकाशित कीं। रामायण और महाभारत के कुछ हिस्सों का संताली में अनुवाद किया, ताकि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ सके। संताली नृत्य, संगीत और लोककथाओं को भी बढ़ावा दिया। उन्होंने आदिवासी संस्कृति विकास संघ जैसी संस्था की स्थापना की, जो आज भी सक्रिय है।

तीन दशकों से ज्यादा समय तक उन्होंने संघर्ष किया। मुश्किल हालात, कम संसाधन और चुनौतियों के बावजूद वे कभी नहीं रुके। उनके प्रयासों से संताली भाषा अब स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल हो रही है और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल रही है। संताली संगीत और कला को भी नई पहचान मिली है।

पद्म श्री,संघर्ष का फल और प्रेरणा

पद्म श्री सम्मान की घोषणा के बाद चरण हेम्ब्रम ने कहा कि उन्हें बहुत खुशी है कि सरकार ने उनकी मेहनत को पहचाना। उन्होंने बताया कि यह सम्मान सिर्फ उनका नहीं, बल्कि पूरे संताली समुदाय और आदिवासी संस्कृति के लिए है। रायरंगपुर में उनके घर पर लोग पहुंच रहे हैं, बधाई दे रहे हैं। स्थानीय लोग कहते हैं कि चरण हेम्ब्रम एक सच्चे योद्धा हैं, जिन्होंने अपनी भाषा को बचाने के लिए जीवन समर्पित कर दिया।

यह सम्मान उन गुमनाम नायकों के लिए भी प्रेरणा है जो बिना किसी शोर-शराबे के समाज के लिए काम करते हैं। ओडिशा से इस बार चार लोगों को पद्म श्री मिल रहा है, जिसमें चरण हेम्ब्रम का नाम सबसे खास है क्योंकि उन्होंने आदिवासी भाषा और संस्कृति को मुख्यधारा में लाने का काम किया।

निष्कर्ष

चरण हेम्ब्रम का यह सम्मान युवाओं को बताता है कि अगर समर्पण हो तो कोई भी मुश्किल नहीं रोक सकती। संताली भाषा अब मजबूत हो रही है, और आने वाली पीढ़ियां इससे प्रेरित होंगी। पूरा मयूरभंज जिला और ओडिशा गर्व महसूस कर रहा है। पत्रकार राजीव कुमार दास की इस खबर से साफ है कि छोटे गांवों से निकले लोग भी देश का नाम रोशन कर सकते हैं।

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