Save Aravalli Movement On Peak: अरावली पहाड़ियां (Aravalli Hills) एक बार फिर देश की सबसे बड़ी पर्यावरणीय बहस के केंद्र में हैं। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) के हालिया फैसले के बाद पर्यावरणविद, सामाजिक संगठन और आम नागरिक सड़कों पर उतर आए हैं, जबकि सोशल मीडिया पर #SaveAravalli ट्रेंड कर रहा है। यह फैसला ‘100-मीटर आदेश’ के नाम से चर्चा में है, जिसमें अरावली क्षेत्र की 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों को स्वतः वन (Forest) मानने से इनकार किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस आदेश का असर सिर्फ हरियाणा (Haryana) या राजस्थान (Rajasthan) तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) की हवा, पानी और तापमान पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। आखिर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा, विरोध क्यों हो रहा है और आगे खतरा कितना बड़ा है चलिए जानते हैं पूरा मामला विस्तार से…
अरावली विवाद और सुप्रीम कोर्ट का आदेश/Save Aravalli Movement On Peak
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अपने हालिया फैसले में स्पष्ट किया कि अरावली क्षेत्र में स्थित 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को केवल उनकी भौगोलिक स्थिति के आधार पर ‘जंगल’ घोषित नहीं किया जा सकता। कोर्ट के अनुसार, किसी भी जमीन को वन भूमि (Forest Land) मानने के लिए उसके राजस्व रिकॉर्ड, सरकारी नोटिफिकेशन और जमीनी सच्चाई को आधार बनाया जाएगा, न कि सिर्फ ऊंचाई को। यह फैसला उस याचिका पर आया, जिसमें अरावली की जमीनों को लेकर क्लासिफिकेशन को चुनौती दी गई थी। फैसले के बाद यह चिंता गहराई कि हरियाणा में तोसाम (Tosham, Bhiwani) और मधोपुरा (Madhopura, Mahendragarh) को छोड़कर ज्यादातर अरावली क्षेत्र 100 मीटर से नीचे है, जो संरक्षण से बाहर हो सकता है।

पर्यावरणविद क्यों जता रहे हैं गंभीर चिंता
‘सेव अरावली ट्रस्ट’ (Save Aravalli Trust) से जुड़े विशेषज्ञ विजय बेनज्वाल (Vijay Benjwal) और नीरज श्रीवास्तव (Neeraj Shrivastava) का कहना है कि यह फैसला अरावली के पूरे इकोसिस्टम के लिए खतरे की घंटी है। अरावली थार मरुस्थल (Thar Desert) से उठने वाली धूल को रोकती है, भूजल रिचार्ज करती है और जैव विविधता को संतुलित रखती है। अगर संरक्षण कमजोर हुआ, तो दिल्ली-एनसीआर में धूल और प्रदूषण बढ़ेगा, AQI और खराब होगा, बोरवेल सूखेंगे और गर्मी ज्यादा तीव्र हो जाएगी। विशेषज्ञों का आरोप है कि इस फैसले से खनन और निर्माण को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे उद्योगपतियों को फायदा होगा, जबकि आम जनता को प्रदूषण और जल संकट की कीमत चुकानी पड़ेगी।
बयान, विरोध और #SaveAravalli अभियान
फैसले के बाद देशभर में विरोध तेज हो गया है। सोशल मीडिया पर #SaveAravalli ट्रेंड कर रहा है और कई शहरों में प्रदर्शन हुए हैं। ट्रस्ट का कहना है कि ब्रिटिश काल में दिल्ली (Delhi) को राजधानी बनाने का एक बड़ा कारण अरावली और यमुना (Yamuna River) का प्राकृतिक संतुलन था। अब इसी संतुलन पर खतरा मंडरा रहा है। अभियान के तहत 150 जिलों के जिलाधिकारियों (District Magistrates) को ज्ञापन सौंपने की योजना है। ऑनलाइन पिटिशन पर अब तक 41 हजार से ज्यादा लोग हस्ताक्षर कर चुके हैं। वहीं कुछ लोगों का तर्क है कि यह फैसला जंगल कटने की गारंटी नहीं है, बल्कि खतरा इसके दुरुपयोग में है, जो राज्य सरकारों की नीति और नीयत पर निर्भर करेगा।
वर्तमान की चुनौतियां और रणनीति
फैसले के बाद अब राज्य सरकारों पर जिम्मेदारी है कि वे तय करें कौन-सी जमीन वन है और कौन-सी नहीं। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भूमि रिकॉर्ड बदले गए और पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) को नजरअंदाज किया गया, तो दिल्ली-एनसीआर की हवा और जहरीली हो सकती है, भूजल और नीचे जाएगा और ‘अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट’ तेज होगा। अरावली को एनसीआर का प्राकृतिक डस्ट बैरियर और कूलिंग सिस्टम माना जाता है। अब सवाल यह है कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बनेगा। कोर्ट ने नियम तो स्पष्ट कर दिए हैं, लेकिन उनका सही इस्तेमाल होगा या नहीं यही तय करेगा कि अरावली आने वाली पीढ़ियों के लिए बचेगी या सिर्फ फाइलों में सिमट कर रह जाएगी।










