Iran Shia Conversion History: ईरान कैसे बना शिया बहुल देश? सुन्नी से शिया बनने की कहानी

Iran Shia Conversion History: ईरान का धार्मिक बदलाव: सुन्नी से शिया बनने का इतिहास

Iran Shia Conversion History: ईरान आज दुनिया का सबसे बड़ा शिया मुस्लिम देश है। यहां की अधिकांश आबादी शिया इस्लाम को मानती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ सदियों पहले ईरान पूरी तरह सुन्नी बहुल देश था? यहां के लोग सुन्नी इस्लाम का पालन करते थे, और कई बड़े सुन्नी धर्मगुरु और विद्वान ईरान (फारस) से ही निकले थे। फिर कैसे और क्यों ईरान सुन्नी से शिया बन गया? आइए इसकी पूरी कहानी सरल भाषा में समझते हैं।

सुन्नी से शिया बनने की पूरी कहानी/Iran Shia Conversion History

ईरान को पहले फारस कहा जाता था। यह दुनिया के सबसे पुराने और शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था। 550 ईसा पूर्व से लेकर 651 ईस्वी तक यहां सासानियन राजवंश का शासन था। उस समय का मुख्य धर्म जरथुस्त्र (जोरोस्ट्रियन) था। फारस की संस्कृति, कला, विज्ञान और दर्शन बहुत उन्नत थे। उनका साम्राज्य हिंदुस्तान से लेकर यूनान तक फैला हुआ था।

इस्लाम का आगमन और सुन्नी बनना

सातवीं सदी में अरब मुस्लिमों ने फारस पर हमला किया। सासानियन सेना हार गई, और इस्लाम यहां पहुंचा। शुरुआत में कई फारसी इस्लाम कबूल नहीं करना चाहते थे, लेकिन धीरे-धीरे बड़ी संख्या में लोगों ने इस्लाम अपनाया। उस समय इस्लाम में सुन्नी मत ही प्रमुख था। इसलिए ईरान सुन्नी बहुल बन गया।

लगभग 900 साल तक (7वीं से 16वीं सदी तक) ईरान में सुन्नी इस्लाम का बोलबाला रहा। यहां के मदरसों से कई बड़े सुन्नी विद्वान निकले। मिसाल के तौर पर:

  • इमाम अल-गजाली (हुज्जतुल इस्लाम) फारसी थे। उनकी किताब ‘एहया उलूम उद दीन’ आज भी पढ़ाई जाती है।
  • मौलाना जलालुद्दीन रूमी की ‘मसनवी’ को फारसी भाषा का कुरान कहा जाता है।
  • हाफिज शिराजी और अन्य सूफी कवियों ने फारसी संस्कृति को इस्लाम के साथ जोड़ा।

फारस का इस्लाम से शुरुआती कनेक्शन

ईरान का इस्लाम से रिश्ता बहुत पुराना है। पैगंबर मोहम्मद साहब के साथी सलमान फारसी पहले ईरानी थे जिन्होंने इस्लाम कबूल किया। उन्होंने मदीना की सुरक्षा के लिए खंदक (खाई) खोदने का आईडिया दिया था। पैगंबर ने उन्हें अहल-ए-बैत का हिस्सा माना।

शिया मान्यताओं में एक खास कनेक्शन है इमाम हुसैन और फारसी राजकुमारी शहरबानू का। शहरबानू सासानियन सम्राट यज्दगर्द तृतीय की बेटी थीं। कहा जाता है कि इमाम हुसैन (पैगंबर के नवासे) से उनका निकाह हुआ। इसी से चौथे शिया इमाम अली अल-सज्जाद का जन्म हुआ। इससे ईरानी लोग खुद को शिया इमामों से जुड़ा महसूस करते हैं। मशहद में इमाम रजा की दरगाह पर करोड़ों लोग जाते हैं।

सफाविद राजवंश: शिया बनने का टर्निंग पॉइंट

ईरान के इतिहास में सबसे बड़ा बदलाव 1501 में आया। शाह इस्माइल प्रथम ने सफाविद राजवंश की नींव रखी। वे एक सूफी सिलसिले से थे और उनके पिता शेख हैदर भी शिया विचारों के करीब थे।

शाह इस्माइल ने सत्ता संभालते ही ट्वेलवर शिया (बारह इमामों वाला शिया मत) को देश का आधिकारिक धर्म घोषित कर दिया। उस समय ईरान की ज्यादातर आबादी सुन्नी थी। लेकिन शाह इस्माइल ने इसे बदलने का बड़ा अभियान चलाया। इसके पीछे मुख्य कारण राजनीतिक थे:

  • पड़ोसी ओटोमन साम्राज्य सुन्नी था। शाह इस्माइल ओटोमन से अलग अपनी मजबूत पहचान बनाना चाहते थे।
  • फारसी राष्ट्रवाद को मजबूत करने के लिए शिया मत को चुना गया, क्योंकि यह अरब सुन्नी प्रभाव से अलग था।

शाह इस्माइल ने अरब देशों (इराक, लेबनान, बहरीन) से शिया विद्वानों और धर्मगुरुओं को बुलाया। मदरसे और मजलिसें बनवाईं। सुन्नी विद्वानों को जबरदस्ती शिया बनने को कहा गया, कई को सजा दी गई या देश निकाला गया। धीरे-धीरे सुन्नी आबादी शिया बनने लगी। इस्फहान और मशहद जैसे शहर धार्मिक केंद्र बन गए।

शिया बनने की प्रक्रिया और समयरेखा

  • 7वीं सदी: इस्लाम आया, ईरान सुन्नी बहुल बना।
  • 1501: शाह इस्माइल ने सफाविद राज शुरू किया और शिया को राज्य धर्म बनाया।
  • 16वीं-17वीं सदी: जबरदस्ती और प्रचार से धर्मांतरण हुआ। शिया विद्वान आए, सुन्नी प्रभाव कम हुआ।
  • 1979: अयातुल्ला खुमैनी की इस्लामी क्रांति ने शिया पहचान को और मजबूत किया। ‘विलायत-ए-फकीह’ (धर्मगुरु का शासन) का सिद्धांत आया।

आज का महत्व

यह बदलाव सिर्फ धार्मिक नहीं था, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक भी था। सफाविदों ने ईरान को शिया बनाकर एक मजबूत राष्ट्रीय पहचान दी। आज ईरान मध्य पूर्व की राजनीति में शिया गठबंधन का केंद्र है। फारसी संस्कृति और शिया इस्लाम का मेल आज भी जीवित है।

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