Karnataka Governor Walkout: राज्यपाल ने सिर्फ 2 लाइन पढ़ीं और छोड़ दिया सदन! कर्नाटक विवाद में राज्यपाल का संबोधन अनिवार्य या नहीं?

Karnataka Governor Walkout: संविधान का अनुच्छेद 176 क्या कहता है! क्या बिना संबोधन के चल सकता है विधानसभा सत्र?

Karnataka Governor Walkout: 22 जनवरी 2026 को कर्नाटक विधानसभा का बजट सत्र शुरू हुआ। लेकिन शुरुआत से ही हंगामा मच गया। राज्यपाल थावरचंद गहलोत विधान सौधा पहुंचे, संयुक्त सत्र को संबोधित करने आए। उन्होंने कैबिनेट द्वारा तैयार भाषण की सिर्फ दो लाइनें पढ़ीं और फिर सदन से बाहर चले गए। विधायकों ने शर्म करो जैसे नारे लगाए, हंगामा हुआ। कांग्रेस विधायकों ने इसे संविधान का उल्लंघन बताया, जबकि विपक्ष ने कहा कि राज्यपाल का अधिकार है।

यह घटना तमिलनाडु और केरल के बाद हुई, जहां भी राज्यपालों के अभिभाषण पर विवाद हुआ। कर्नाटक में विवाद का मुख्य कारण सरकारी भाषण में ‘G RAM G’ बिल (जो MGNREGA की जगह नया रोजगार कानून लाने वाला है) का जिक्र था। राज्यपाल ने इसे केंद्र सरकार के खिलाफ प्रचार बताया और 11 पैराग्राफ हटाने को कहा। सरकार ने मना किया, तो राज्यपाल ने पूरा भाषण पढ़ने से इनकार कर दिया।

संविधान क्या कहता है? राज्यपाल का संबोधन अनिवार्य है या नहीं?/Karnataka Governor Walkout

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 176 स्पष्ट रूप से कहता है कि हर साल विधानसभा के पहले सत्र की शुरुआत में राज्यपाल को विधानसभा (या विधान परिषद वाली राज्य में दोनों सदनों को संयुक्त रूप से) संबोधित करना होगा। इसमें सरकार की नीतियां और सत्र बुलाने के कारण बताने होते हैं। यह अनिवार्य है।

अनुच्छेद 176(1) कहता है: “प्रत्येक वर्ष के पहले सत्र की शुरुआत में राज्यपाल विधान सभा को संबोधित करेंगे और विधानमंडल को सत्र बुलाने के कारण बताएंगे।” अनुच्छेद 176(2) में कहा गया है कि सदन के नियमों में इस संबोधन पर चर्चा के लिए समय तय किया जाएगा।

कई कानूनी विशेषज्ञ और पुराने फैसलों के अनुसार, अगर राज्यपाल यह संबोधन नहीं देते, तो सत्र की शुरुआत अवैध मानी जा सकती है। कलकत्ता हाईकोर्ट के एक पुराने फैसले (1966) में कहा गया था कि राज्यपाल के संबोधन के बिना विधानसभा का कामकाज अवैध हो सकता है। लेकिन व्यवहार में ऐसा बहुत कम हुआ है।

राज्यपाल का भाषण सरकार द्वारा तैयार किया जाता है, क्योंकि राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख होते हैं और मंत्रिमंडल की सलाह पर काम करते हैं (अनुच्छेद 163)। लेकिन अगर भाषण में कुछ आपत्तिजनक, असत्य या संविधान विरोधी लगे, तो राज्यपाल कुछ हिस्से छोड़ सकते हैं या बदलाव मांग सकते हैं। विपक्षी नेता आर. अशोक ने कहा कि संविधान में कोई नियम नहीं कि राज्यपाल सरकार के हर शब्द को पढ़ें।

कर्नाटक सरकार का रुख और क्या होगा आगे?

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरामैया ने राज्यपाल के कदम की निंदा की। उन्होंने कहा कि यह संविधान का उल्लंघन है और सरकार कानूनी कार्रवाई पर विचार कर रही है। कानून मंत्री एच.के. पाटिल ने कहा कि अनुच्छेद 176 के तहत राज्यपाल को पूरा संबोधन देना जरूरी है। सरकार ने पहले ही राज्यपाल से मुलाकात की थी, लेकिन समझौता नहीं हुआ।

सत्र 31 जनवरी तक चलेगा। अब सवाल है कि क्या सत्र बिना पूरा संबोधन के आगे बढ़ सकता है? कानूनी रूप से संबोधन अनिवार्य है, लेकिन अगर राज्यपाल नहीं देते, तो सदन अपने नियमों से काम चला सकता है। कई बार ऐसे विवादों में सदन आगे बढ़ जाता है, लेकिन यह राजनीतिक संकट पैदा करता है।

अन्य राज्यों में भी यही विवाद क्यों बढ़ रहा है?

तमिलनाडु में राज्यपाल आर.एन. रवि ने भाषण में “असत्य तथ्य” बताकर बीच में छोड़ दिया। केरल में भी राज्यपाल ने कुछ हिस्से छोड़े। ये सब गैर-बीजेपी शासित राज्यों में हो रहा है। केंद्र और राज्य के बीच तनाव बढ़ रहा है। राज्यपाल केंद्र द्वारा नियुक्त होते हैं, तो विपक्ष कहता है कि वे केंद्र के इशारे पर काम कर रहे हैं।

निष्कर्ष

संक्षेप में, संविधान के अनुसार राज्यपाल का संबोधन अनिवार्य है, खासकर साल के पहले सत्र में। बिना इसके सत्र शुरू होना संवैधानिक रूप से सही नहीं माना जाता। लेकिन व्यवहार में अगर राज्यपाल आंशिक संबोधन देकर चले जाते हैं, तो सदन आगे बढ़ जाता है। कर्नाटक में अब हंगामा जारी है। सुप्रीम कोर्ट तक मामला जा सकता है। यह दिखाता है कि राज्यपाल और चुनी हुई सरकार के बीच संतुलन कितना नाजुक है।

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