Maithili Thakur Youngest MLA Bihar: बिहार की सबसे कम उम्र की विधायक बनीं मैथिली ठाकुर,जानिए उनकी उम्र कितनी है

Maithili Thakur Youngest MLA Bihar: मैथिली ठाकुर का ऐतिहासिक प्रदर्शन, बिहार में सबसे युवा विधायक बनी।

Maithili Thakur Youngest MLA Bihar: मैथिली ठाकुर मुख्य रूप से मैथिली, भोजपुरी, हिंदी, सूफी और भक्ति गीत गाती हैं। उनके लोक गीत मिथिला की परंपरा, प्रकृति, प्रेम, वियोग और राम-सीता कथाओं से प्रेरित होते हैं। उनके गीतों में 12 भाषाओं का मिश्रण है, लेकिन मैथिली और भोजपुरी लोक शैली उनकी पहचान है।

एक गायिका का राजनीतिक सफर/Maithili Thakur Youngest MLA Bihar

बिहार की धरती, जहां लोक संगीत की धुनें सदियों से गूंजती आई हैं, आज एक नई धुन बजा रही है। 14 नवंबर 2025 को बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने पूरे देश को चौंका दिया, जब 25 वर्षीय लोक गायिका मैथिली ठाकुर ने दरभंगा जिले के अलीनगर विधानसभा क्षेत्र से शानदार जीत हासिल की। यह जीत केवल एक चुनावी सफलता नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक प्रतीक का राजनीतिक परिवर्तन है। मैथिली, जो कभी टीवी रियलिटी शोज की चमकती सितारा थीं, आज बिहार की सबसे कम उम्र की विधायक बन चुकी हैं। उनकी उम्र मात्र 25 वर्ष है, जो उन्हें राज्य विधानसभा में सबसे युवा प्रतिनिधि बनाती है। यह खबर न केवल बिहार के लिए, बल्कि पूरे भारत के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। आइए, हम इस युवा कलाकार के सफर को करीब से देखें, जहां संगीत की मिठास ने राजनीति की कठोर जमीन को भी नरम कर दिया।

मैथिली का जन्म और संगीतमय परिवार

मैथिली ठाकुर का जन्म 25 जुलाई 2000 को मधुबनी जिले के बेनीपट्टी में एक संगीतमय परिवार में हुआ। उनके पिता, रामेश ठाकुर, एक शास्त्रीय गायक और शिक्षक हैं, जिन्होंने बचपन से ही मैथिली को संगीत की बारीकियां सिखाईं। मां पूजा ठाकुर घर संभालती हैं, लेकिन परिवार की धड़कन संगीत ही है। मैथिली के दो भाई, आयची ठाकुर और ऋषभ ठाकुर, उनके साथ मिलकर एक संगीतमय तिकड़ी बनाते हैं। ये भाई-बहन मैथिली और भोजपुरी लोक गीतों को न केवल गाते हैं, बल्कि देश-विदेश में प्रस्तुत भी करते हैं। मैथिली की आवाज में 12 भाषाओं की मिठास है – हिंदी, मैथिली, भोजपुरी से लेकर सूफी और भक्ति रचनाओं तक। उनका परिवार ही उनकी सबसे बड़ी ताकत रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान भी भाई-बहनों ने लोक गीतों के माध्यम से जनसंपर्क किया, जिससे अलीनगर के गलियारों में संगीत की लहर दौड़ गई।

यह परिवार न केवल संगीत का खजाना है, बल्कि सांस्कृतिक जागरण का प्रतीक भी। मैथिली कहती हैं, “संगीत ने मुझे सिखाया कि हर दिल को जोड़ा जा सकता है। राजनीति भी तो यही है – लोगों के दिलों को जोड़ना।” उनके जन्म से ही मिथिला की मिट्टी ने उन्हें पोषित किया, जहां मैथिली भाषा और लोक कला का बोलबाला है। आज, जब वे विधायक बनकर लौटेंगी, तो यह मिट्टी उनके कंधों पर नई जिम्मेदारी सौंपेगी।

संगीत की दुनिया में चमक, रियलिटी शोज से वैश्विक पहचान

मैथिली का संगीतमय सफर बचपन से ही चमकदार रहा। मात्र 11 वर्ष की उम्र में उन्होंने ‘सारेगामा लिटल चैंप्स’ (2011) में भाग लिया, जहां उनकी मधुर आवाज ने जजों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद 2015 में ‘इंडियन आइडल जूनियर’ ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी। लेकिन असली सफलता 2016 में आई, जब उन्होंने ‘iGenius यंग सिंगिंग स्टार’ प्रतियोगिता जीती। इस जीत के बाद उनका पहला एल्बम ‘या रब्बा’ रिलीज हुआ, जिसमें भक्ति और लोक गीतों का अनोखा मिश्रण था।

मैथिली की खासियत है उनका बहुभाषी गायन। वे मैथिली लोकगीतों को सूफी स्टाइल में पिरोती हैं, जो यूट्यूब पर करोड़ों व्यूज बटोर चुके हैं। उनके सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स हैं, जो ज्यादातर युवा हैं। ‘राइजिंग स्टार’ जैसे शोज में उनकी परफॉर्मेंस ने उन्हें ‘फोक क्वीन’ का खिताब दिलाया। दुनिया भर में 12 भाषाओं में गाए उनके गीत मिथिला की संस्कृति को वैश्विक पटल पर ले गए। लेकिन मैथिली कभी स्टेज की चकाचौंध में खोईं नहीं। वे कहती हैं, “संगीत मेरे लिए सेवा है, न कि शोहरत।” इसी सेवा भाव ने उन्हें राजनीति की ओर मोड़ा।

राजनीति में प्रवेश, बीजेपी का सांस्कृतिक दांव

मैथिली का राजनीतिक सफर हालिया है। कुछ महीनों पहले ही उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का दामन थामा। अलीनगर, जो 2008 से बना एक मुस्लिम बहुल क्षेत्र है, बीजेपी के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा। यहां आरजेडी का दबदबा था, लेकिन मैथिली की उम्मीदवारी ने समीकरण बदल दिए। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उनकी रैली में हिस्सा लिया, जो उनके महत्व को दर्शाता है। मैथिली ने प्रचार में संगीत का सहारा लिया – भाइयों के साथ लोक गीत गाकर उन्होंने वोटरों के दिल जीते।

मैथिली का चुनावी वादा अनोखा था,अलीनगर का नाम ‘सीतानगर’ करने का।

मैथिली कहती हैं, “यह क्षेत्र माता सीता की जन्मभूमि से जुड़ा है, नाम बदलना सांस्कृतिक सम्मान होगा।” शिक्षा सुधार, युवा रोजगार और सांस्कृतिक पुनरुद्धार उनके एजेंडे में प्रमुख हैं। विपक्ष ने उन्हें ‘बाहरी’ कहा, लेकिन मैथिली ने हिंदुत्व और सांस्कृतिक पहचान को अपनाकर जवाब दिया। उनका परिवार प्रचार में सक्रिय रहा – मामा नंद किशोर झा और सुमित झा ने लॉजिस्टिक्स संभाली। यह जीत बीजेपी की अलीनगर में पहली सफलता है, जो युवा वोटरों को जोड़ने की रणनीति का प्रमाण है।

जीत का आंकड़ा और ऐतिहासिक महत्व*

चुनाव नतीजों में मैथिली ने आरजेडी के दिग्गज बिनोद मिश्रा को 11,700 से अधिक वोटों से हराया। 24 राउंड की गिनती में उन्होंने कभी लीड नहीं छोड़ी। जन सूरज पार्टी के बिप्लव कुमार चौधरी भी पीछे रहे। यह जीत बिहार विधानसभा में सबसे कम उम्र की विधायक का रिकॉर्ड स्थापित करती है। पहले, 2005 में 26 वर्षीय तौसीफ आलम (स्वतंत्र) और 2015 में तेजस्वी यादव (आरजेडी) सबसे युवा थे। मैथिली की उम्र 25 वर्ष है, जो विधानसभा के औसत उम्मीदवार आयु (51 वर्ष) से आधी है।

यह जीत केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में युवा ऊर्जा का संकेत है। अन्य युवा उम्मीदवार जैसे रविना कुशवाहा (27), शिवानी शुक्ला (28) भी मैदान में हैं, लेकिन मैथिली की जीत ने सबको प्रेरित किया। वे कहती हैं, “मैं साबित करूंगी कि 25 वर्ष की महिला विधायक अन्यों से तेज काम कर सकती है।”

संगीत और सेवा का संगम

विधायक बनने के बाद मैथिली का फोकस अलीनगर पर है। शिक्षा में सुधार, जहां लड़कियों की ड्रॉपआउट दर कम हो, युवाओं को रोजगार और सांस्कृतिक उत्सवों का आयोजन – ये उनके सपने हैं। वे चाहती हैं कि मिथिला की लोक कला को राजनीतिक मंच मिले। “मैं अपनी आवाज से अब विधानसभा में गूंजूंगी,” वे मुस्कुराते हुए कहती हैं। उनका परिवार उनका सहारा बनेगा, और सोशल मीडिया युवाओं को जोड़ेगा।

मैथिली की कहानी साबित करती है कि उम्र केवल आंकड़ा है। एक गायिका से विधायक बनना, वह भी सबसे कम उम्र की, यह बिहार की नई पीढ़ी का संदेश है। आने वाले दिनों में उनकी धुनें राजनीति को और मधुर बनाएंगी।

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