रायबरेली: मानदेय के इंतज़ार में बुझी ‘आशा’, सिस्टम की चुप्पी सबसे बड़ी बीमारी, सीएमओ ने बजट बचाया, इंसानियत नहीं….

बजट बचाने में आगे स्वास्थ्य विभाग, लेकिन जमीनी हकीकत में इलाज और भुगतान दोनों नदारद

रायबरेली का स्वास्थ्य विभाग इन दिनों एक नई उपलब्धि पर इतराता दिखे तो हैरानी मत कीजिए। 13 करोड़ रुपये खर्च न कर पाने की ऐतिहासिक सफलता जो हासिल हुई है। जनता इलाज को तरसती रही, आशाएं (ASHA) मानदेय के लिए दर-दर भटकती रहीं, लेकिन विभागीय कुर्सियों की सेहत हमेशा दुरुस्त रही। सीएमओ डॉ नवीन चंद्रा और उनके सिपहसलार सब के सब कमीशन और वसूली के रास्ते तलाशते रहे।

ऊंचाहार सीएचसी की आशा बिटाना देवी मियांपुर जो खुद गंभीर बीमारी से जूझ रही थी, शायद सिस्टम की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं थी। उन्हें ठीक से इलाज नहीं मिला, मानदेय नहीं मिला, हाँ, फाइलों में योजनाएं जरूर मिलती रहीं। आखिरकार, वह इस “सुव्यवस्थित” स्वास्थ्य तंत्र को अलविदा कह गई।

माना तो यह जाएगा कि बिटाना देवी को बीमारी ने मौत की नींद सुला दिया है, लेकिन उस बीमारी का क्या जो बिना कमीशन के मानदेय नहीं देती? उस बीमारी का क्या जिसे हर भुगतान से पहले अपना हिस्सा चाहिए? सवाल यह नहीं कि स्वास्थ्य विभाग से बिना खर्च 13 करोड़ वापस क्यों गए, सवाल यह है कि इंसानियत कब वापस आएगी? यहां बजट तो लौट जाता है, लेकिन संवेदनाएं नहीं आतीं। कागजों पर योजनाएं दम तोड़ती हैं और जमीन पर लोग।

शायद अब विभाग को एक नई योजना लानी चाहिए—“मृत आशाओं के नाम संवेदना पैकेज”, क्योंकि जिंदा लोगों के लिए तो कुछ बचा नहीं। आशा/संगिनी कर्मचारी संघ की अध्यक्ष ऊषा बाजपेई ने कहा कि बजट वापस कर दिया गया लेकिन आशा बहुओं का भुगतान नहीं किया गया, यह संवेदनहीनता है। केवल झूठा आश्वासन दिया गया था कि मार्च 31 तक सारा भुगतान करा दिया जाएगा।

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