बच्चा गोद लेने वाली माताओं को जैविक मांओं जैसे अधिकार, Supreme Court ने लिया ऐतिहासिक फ़ैसला!

Supreme Court Historic Decision: नई दिल्ली (New Delhi) से एक ऐसा फैसला आया है जो न केवल दत्तक माताओं के अधिकारों को मजबूत करता है, बल्कि पूरे समाज में मातृत्व की परिभाषा को नया आयाम देता है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने मंगलवार को एक पुराने कानूनी प्रावधान को असंवैधानिक घोषित करते हुए घोषणा की कि बच्चा गोद लेने वाली हर महिला को, चाहे बच्चे की उम्र कुछ भी हो, गोद लेने की तारीख से 12 हफ्ते का मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) मिलेगा। यह निर्णय जैविक मांओं और दत्तक मांओं के बीच के भेदभाव को समाप्त करता है, जो वर्षों से एक अन्यायपूर्ण बाधा के रूप में खड़ा था। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मातृत्व का अधिकार बच्चे के आने के तरीके पर निर्भर नहीं करता! यह भावनात्मक बंधन और देखभाल की आवश्यकता पर आधारित है। इस फैसले से लाखों महिलाओं को न्याय मिलेगा, जो गोद लेने के बाद भी कार्यस्थल पर समान अवसरों से वंचित रहीं।

पुराने प्रावधान का हुआ अंत

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने मंगलवार को कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी 2020 (Code on Social Security 2020) की धारा 60(4) को असंवैधानिक घोषित कर दिया, जो गोद लेने वाली माताओं के लिए मैटरनिटी लीव को केवल तीन महीने से कम उम्र के बच्चों तक सीमित रखता था। यह प्रावधान वर्षों से दत्तक माताओं के लिए एक कठोर बाधा साबित हो रहा था, क्योंकि भारत में गोद लेने का ढांचा शायद ही कभी इतनी छोटी उम्र के बच्चों को उपलब्ध कराता है। कोर्ट ने कहा कि बच्चे की उम्र चाहे जो भी हो, गोद लेने की तारीख से 12 हफ्ते की छुट्टी का अधिकार सभी दत्तक माताओं को मिलेगा। यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 14 (Article 14) और अनुच्छेद 21 (Article 21) का उल्लंघन करने वाले इस वर्गीकरण को भेदभावपूर्ण बताते हुए उजागर करता है। जस्टिस बेंच ने सुनवाई के दौरान जोर दिया कि मैटरनिटी लीव का उद्देश्य बच्चे के साथ मां के भावनात्मक जुड़ाव को मजबूत करना है, न कि बच्चे के जन्म के तरीके पर आधारित कोई मनमाना नियम। इस निर्णय से कार्यरत महिलाओं को नया आत्मविश्वास मिलेगा, जो गोद लेने के निर्णय को बिना किसी कानूनी चिंता के ले सकेंगी। पुराने नियम ने लाखों दत्तक माताओं को इस लाभ से वंचित रखा था, लेकिन अब समानता का द्वार खुल गया है।

जैविक और दत्तक मातृत्व में कोई भेदभाव नहीं

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जैविक मां (Biological Mother) की तरह दत्तक मां (Adoptive Mother) को भी पूर्ण मातृत्व अवकाश का अधिकार है, क्योंकि मातृत्व की आवश्यकताएं बच्चे की उम्र या उसके परिवार में आने के तरीके पर निर्भर नहीं करतीं। बेंच ने कहा कि प्रजनन की आजादी का अधिकार केवल जैविक जन्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह माता-पिता बनने की संवैधानिक अवधारणा का विस्तार है, जिसमें गोद लेना भी शामिल है। चाहे तीन महीने से कम उम्र का बच्चा हो या उससे अधिक, दत्तक मां को बच्चे के साथ बंधन स्थापित करने, उसकी देखभाल करने और परिवार में ढालने के लिए समान समय की आवश्यकता होती है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि एक मां में कोई फर्क नहीं किया जा सकता—चाहे वह बच्चे को कोख से जने या गोद लेकर लाए। यह दृष्टिकोण मातृत्व को एक सार्वभौमिक अधिकार के रूप में स्थापित करता है, जो लिंग और जैविकता से परे है। इस फैसले से समाज में गोद लेने की प्रक्रिया को प्रोत्साहन मिलेगा, क्योंकि अब महिलाएं बिना कैरियर के डर के इस नेक कार्य को अपना सकेंगी। कोर्ट की यह टिप्पणी दत्तक मातृत्व को जैविक मातृत्व के बराबर सम्मान देने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी।

लिंग-तटस्थ नीति की ओर

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने केंद्र सरकार से पैटरनिटी लीव (Paternity Leave) शुरू करने पर विचार करने का निर्देश दिया, इसे एक सामाजिक कल्याण उपाय के रूप में देखते हुए। कोर्ट ने कहा कि बच्चे की देखभाल में पिता की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, इसलिए नीतियां अधिक लिंग-तटस्थ (Gender-Neutral) और समावेशी होनी चाहिए। यह सुझाव मातृत्व लाभों को व्यापक बनाते हुए पूरे परिवार को मजबूत करने की दिशा में एक प्रगतिशील कदम है। बेंच ने देखभाल के मामले में संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया, जहां पिता भी बच्चे के साथ बंधन बनाने में सक्रिय भागीदार बनें। वर्तमान में मैटरनिटी लीव पर केंद्रित नीतियां माताओं तक सीमित हैं, लेकिन कोर्ट का यह निर्देश पितृत्व को समान महत्व प्रदान करने का संकेत देता है। इससे कार्यस्थलों पर परिवार समर्थक संस्कृति विकसित होगी, जो कर्मचारियों के कल्याण को बढ़ावा देगी। केंद्र सरकार यदि इस पर अमल करती है, तो यह फैसला परिवार निर्माण की नई परिभाषा गढ़ेगा। कोर्ट की यह सोच समाज को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश है, जो लंबे समय से लंबित मांग को पूरा कर सकती है।

क्या है फैसले का मूल आधार

कोर्ट ने फैसले का आधार बच्चे के सर्वोत्तम हित (Best interest of the child) को बनाया, खासकर उन बच्चों के लिए जो संस्थागत देखभाल से आते हैं। बड़े बच्चों को नए परिवार में भावनात्मक रूप से घुलने-मिलने में अधिक समय लगता है, इसलिए दत्तक मां को 12 हफ्ते का अवकाश अनिवार्य है। कोर्ट ने कहा कि सबसे जरूरी बच्चे का भला है, जिसमें नए परिवार में ढलने के लिए पर्याप्त समय शामिल है। यह दृष्टिकोण गोद लेने की प्रक्रिया को मानवीय बनाता है, जहां बच्चे की मनोवैज्ञानिक जरूरतों को प्राथमिकता दी जाती है। संस्थागत देखभाल से मुक्त होकर परिवार में आने वाले बच्चे अक्सर अनिश्चितता का सामना करते हैं, और मां का लगातार साथ ही उन्हें स्थिरता प्रदान कर सकता है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि मातृत्व संरक्षण बच्चे के हित में है, न कि केवल मां के लिए। इससे गोद लेने के मामलों में वृद्धि होगी, जो अनाथालयों की बोझ को कम करेगी। यह फैसला बच्चा कल्याण के क्षेत्र में एक मॉडल स्थापित करता है, जहां कानून परिवार और बच्चे दोनों के हितों को संतुलित करता है।

कर्नाटक वकील की ऐतिहासिक लड़ाई

यह क्रांतिकारी फैसला कर्नाटक (Karnataka) की वकील हमसानंदिनी नंदुरी (Hamsanandini Nanduri) की याचिका पर आया, जिन्होंने मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट 1961 (Maternity Benefit Act 1961) के उस प्रावधान को चुनौती दी जो बाद में 2020 के कोड में शामिल हो गया था। उन्होंने इसे मनमाना और भेदभावपूर्ण बताया, क्योंकि भारत का गोद लेने का ढांचा तीन महीने से कम उम्र के बच्चों को शायद ही उपलब्ध कराता है। याचिका की पैरवी वकील बानी दीक्षित (Bani Dixit) ने की, जिन्होंने कोर्ट को तर्क दिया कि उम्र सीमा वाला लाभ अधिकांश मामलों में बेमानी है। हमसानंदिनी नंदुरी (Hamsanandini Nanduri) ने इस मुद्दे को उठाकर न केवल अपने लिए, बल्कि सभी दत्तक माताओं के लिए न्याय की मांग की। कोर्ट ने उनकी याचिका को स्वीकार करते हुए कानूनी प्रावधान को बदल दिया। यह व्यक्तिगत प्रयास सामूहिक लाभ का प्रतीक है, जो दिखाता है कि एक नागरिक की आवाज कैसे राष्ट्रीय नीति को प्रभावित कर सकती है। इस याचिका ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) को मातृत्व अधिकारों की समीक्षा करने का अवसर दिया।

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