Supreme Court Questions on SIR: वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में बड़ी बहस छिड़ गई है। आरजेडी सांसद मनोज झा (Manoj Jha) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल (Kapil Sibal) ने कई गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया के तहत मतदाताओं को खुद यह साबित करना होगा कि वे भारतीय नागरिक हैं और उनके माता-पिता का जन्म भारत में हुआ था। सिब्बल ने दलील दी कि जिन लोगों के माता-पिता कई दशक पहले गुजर चुके हैं या जिनके रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं, उनके लिए यह प्रक्रिया असंभव और अनुचित है। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (CJI Surya Kant) ने कुछ तीखी टिप्पणियां कीं और सरकार द्वारा बनाए गए नियमों को लेकर अदालत में गहरी चर्चा हुई। तो चलिए जानते हैं पूरा मामला क्या है, विस्तार से…
SIR प्रक्रिया पर उठे बुनियादी सवाल/Supreme Court Questions on SIR
वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर याचिकाकर्ता आरजेडी सांसद मनोज झा (Manoj Jha) ने सुप्रीम कोर्ट में जोरदार आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि SIR की प्रक्रिया व्यवहारिक तौर पर बेहद कठिन है क्योंकि इसमें मतदाता को अपना जन्म प्रमाणपत्र या अपने माता-पिता की भारतीय नागरिकता का दस्तावेज देना होगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी मतदाता के पिता ने 2003 के चुनाव में वोट नहीं दिया या उससे पहले ही उनका निधन हो गया, तो नागरिकता साबित करने के लिए सबूत कहां से लाया जाएगा? मनोज झा का तर्क है कि यह प्रक्रिया उन लाखों लोगों के लिए असहनीय बोझ बन जाएगी, जिनके पारिवारिक रिकॉर्ड अधूरे हैं। उनका कहना है कि मताधिकार लोकतंत्र की बुनियाद है और इसे ऐसे मानकों से नहीं बांधा जा सकता जो आम नागरिक के लिए असंभव हों।

पिता के जन्म का प्रमाण कहां से लाऊं?
याचिकाकर्ता की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल (Kapil Sibal) ने कोर्ट में कई तीखे सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि SIR में लागू किए गए नियम विदेशी (नागरिक) अधिनियम के प्रावधानों की तरह हैं, जहां नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी व्यक्ति पर डाल दी जाती है। सिब्बल ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि गणनाकर्ता पूछे- “आपके पिता का जन्म कब हुआ? इसका प्रमाण दिखाइए”- तो आम नागरिक यह प्रमाण कैसे देगा? उन्होंने कहा कि कई लोगों के माता-पिता पुराने समय में वोटर नहीं थे या उनकी मृत्यु बहुत पहले हो चुकी है। ऐसे में दस्तावेज उपलब्ध करवाना असंभव है। सिब्बल ने चेतावनी देते हुए कहा कि यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ जा सकती है और इसका दुरुपयोग भी संभव है। उन्होंने इस प्रक्रिया को “मूल रूप से खतरनाक और अनुचित” बताया।
BLO की शक्तियों पर कोर्ट में बड़ी आपत्ति
अपने तर्कों को आगे बढ़ाते हुए कपिल सिब्बल (Kapil Sibal) ने बूथ लेवल ऑफिसरों (BLO) के अधिकार क्षेत्र पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि BLO अधिकतर स्कूल शिक्षक होते हैं, और यह उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता कि वे तय करें कि कोई व्यक्ति मानसिक रूप से विक्षिप्त है या भारतीय नागरिक है। सिब्बल ने कहा कि नागरिकता निर्धारण एक जटिल प्रक्रिया है, जिसे प्रशिक्षित और सक्षम अधिकारियों द्वारा ही देखा जाना चाहिए, न कि स्कूल शिक्षकों द्वारा। उन्होंने कहा कि BLO को इतनी गंभीर शक्तियां देना प्रक्रियात्मक रूप से खतरनाक है और इससे मनमानी का खतरा बढ़ सकता है। इस पर कोर्ट ने भी सहमति जताई कि यह एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दा है, जिसे गंभीरता से देखा जाना चाहिए। इस बहस ने SIR की वैधता पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया है।
CJI की टिप्पणी और आगे की सुनवाई
कपिल सिब्बल (Kapil Sibal) के तर्कों को सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (CJI Surya Kant) ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के पिता का नाम वोटर सूची में नहीं है और नागरिक ने स्वयं भी समय पर आवश्यक दस्तावेज़ नहीं जुटाए, तो संभव है कि वह “प्रक्रिया में चूक” गया हो। यह टिप्पणी अदालत में मौजूद सभी पक्षकारों का ध्यान खींच गई। हालांकि बेंच ने यह भी कहा कि मामला संवेदनशील है और इसे जल्दबाजी में निपटाया नहीं जा सकता। अदालत ने फिलहाल इस मुद्दे पर विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता जताई है। अब अगली सुनवाई 2 दिसंबर को होगी, जहां SIR प्रक्रिया, BLO की शक्तियों और नागरिकता प्रमाण के बोझ जैसे सवालों पर गहन विचार होगा। यह सुनवाई मतदाता पहचान और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े कई महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दों को दिशा दे सकती है।










