ट्रंप vs ईरान : मध्य पूर्व में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच चल रही जंग अब अपने 26वें दिन में पहुंच गई है। दोनों तरफ हमले जारी हैं, लेकिन शांति की बातें भी हो रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कह रहे हैं कि बातचीत अच्छी चल रही है और जल्द ही समझौता हो जाएगा। लेकिन ईरान इन बातों को सिरे से खारिज कर रहा है और कह रहा है कि कोई सीधी बातचीत नहीं हो रही, सिर्फ मध्यस्थ देशों के जरिए संदेश आ-जा रहे हैं।
ईरान ने शांति वार्ता और संघर्ष विराम (सीजफायर) के लिए कुछ बहुत सख्त शर्तें रख दी हैं, जिन्हें देखकर विशेषज्ञ कह रहे हैं कि समझौता करना बेहद मुश्किल होगा। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर हो क्या रहा है।

युद्ध का हाल क्या है और तनाव क्यों बढ़ा?
जंग शुरू हुए 26 दिन बीत चुके हैं। इस दौरान हिजबुल्लाह ने इजराइल के हाइफा-नहरिया इलाके पर 30 से ज्यादा रॉकेट दागे। ईरान ने इजराइल की एयरोस्पेस फैक्टरियों पर ड्रोन हमले किए। इजराइल ने ईरान के शिराज एयरपोर्ट समेत कई जगहों पर हमले किए। कुवैत एयरपोर्ट के फ्यूल टैंक में आग लग गई।
स्ट्रीट ऑफ होर्मुज (हॉर्मुज की खाड़ी) में तनाव सबसे बड़ा है। दुनिया का बहुत सारा तेल इसी रास्ते से गुजरता है। ईरान कह रहा है कि वह गैर-दुश्मन देशों के जहाजों को तो जाने देगा, लेकिन अमेरिका और इजराइल के जहाजों पर सख्ती बरतेगा। इस वजह से तेल की कीमतें 94-97 डॉलर प्रति बैरल पर बनी हुई हैं।
ईरान की मुख्य शर्तें क्या हैं?
ईरान ने मध्यस्थ देशों (ओमान, कतर और पाकिस्तान) के जरिए अमेरिका को चार बड़ी शर्तें बताई हैं:
- लिखित गारंटी — अमेरिका और इजराइल लिखकर दें कि भविष्य में कभी भी ईरान पर कोई सैन्य कार्रवाई नहीं करेंगे।
- पूर्ण मुआवजा — युद्ध में हुई जान-माल की हर क्षति का पूरा हर्जाना अमेरिका और उसके सहयोगी देश दें।
- हॉर्मुज पर पूरा नियंत्रण— ईरान को स्ट्रीट ऑफ होर्मुज पर पूर्ण नियंत्रण मिले। वहां अमेरिकी और इजराइली जहाजों पर सख्त शर्तें लगाई जा सकें।
- मिसाइल और ड्रोन प्रोग्राम पर कोई रोक नहीं — ईरान अपने बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रम को पूरी तरह जारी रखेगा, कोई पाबंदी नहीं लगेगी।
इसके अलावा ईरान की और मांगें भी हैं:
- खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका की सभी सैन्य बेस बंद हों।
- इजराइल हिजबुल्लाह पर हमले तुरंत बंद करे।
- ईरान पर लगी सारी आर्थिक पाबंदियां (सैंक्शंस) हटा दी जाएं।
ईरान का कहना है कि अमेरिका पहले दो बार धोखा दे चुका है, इसलिए तीसरी बार कोई जोखिम नहीं लेंगे।
ट्रंप का दावा और अमेरिका की स्थिति
ट्रंप कह रहे हैं कि बातचीत बहुत अच्छी चल रही है। उन्होंने उप राष्ट्रपति JD वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो को बातचीत का नेतृत्व सौंपा है। ट्रंप का दावा है कि ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा और समझौता जल्द हो जाएगा। उन्होंने ईरान की पावर प्लांट्स पर हमले की धमकी दी थी, लेकिन बाद में 5 दिन के लिए टाल दी।
ट्रंप ने कहा कि ईरान ने तेल और गैस से जुड़ा “बहुत बड़ा ऑफर” दिया है, लेकिन ईरान इसे सिरे से नकार रहा है। ईरान कहता है कि कोई सीधी बातचीत नहीं हुई, सिर्फ मध्यस्थों के जरिए संदेश आए हैं।
भारत और पाकिस्तान का रोल
भारत इस जंग से सीधे प्रभावित है क्योंकि हमारा बहुत सारा तेल हॉर्मुज से आता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रंप से फोन पर बात की और कहा कि स्ट्रीट ऑफ होर्मुज खुला और सुरक्षित रहे। भारत के नागरिकों की सुरक्षा और तेल आपूर्ति पर भी चिंता जताई।
पाकिस्तान मध्यस्थ के रूप में शामिल है। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि पाकिस्तान में अमेरिका-ईरान की बैठक हो सकती है, जिसमें JD वेंस भी शामिल हो सकते हैं। लेकिन ईरान ने कहा कि पाकिस्तान में सीधी बैठक की संभावना बहुत कम है।
बातचीत में रोड़े क्यों?
विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान की शर्तें इतनी सख्त हैं कि समझौता दूर दिख रहा है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम बंद करे, मिसाइल प्रोग्राम सीमित करे और क्षेत्र में प्रॉक्सी ग्रुप्स (हिजबुल्लाह, हमास आदि) को सपोर्ट बंद करे। ईरान इनमें से किसी पर भी तैयार नहीं दिख रहा।
पिछले कुछ दिनों में अमेरिका ने ईरान को 15 सूत्री योजना भेजी थी, लेकिन दोनों तरफ से इनकार और दावे जारी हैं। ईरान कह रहा है कि बिना अपनी शर्तें माने कोई सीजफायर नहीं होगा।
निष्कर्ष
अभी स्थिति काफी जटिल है। ट्रंप आशावादी दिख रहे हैं, लेकिन ईरान सख्त रुख अपनाए हुए है। अगर बातचीत सफल हुई तो मध्य पूर्व में शांति आ सकती है, तेल की कीमतें गिरेंगी और दुनिया को राहत मिलेगी। लेकिन अगर बात नहीं बनी तो युद्ध और बढ़ सकता है, जिसका असर पूरे विश्व पर पड़ेगा – खासकर भारत जैसे तेल आयातक देशों पर।










