Why Jews Wear Kippah: दुनिया भर में यहूदी समुदाय की एक खास पहचान है – सिर पर छोटी गोल टोपी। इजरायल की सड़कों पर, यरुशलम के बाजारों में या दुनिया के किसी भी यहूदी इलाके में आप अक्सर पुरुषों को ऐसी टोपी पहने देखेंगे। यह टोपी सिर्फ फैशन या मौसम से बचाव के लिए नहीं पहनी जाती, बल्कि यह गहरी धार्मिक भावना, सम्मान और ईश्वर के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है। इसे किप्पा (Kippah) कहा जाता है। इजरायल में इसे इसी नाम से जाना जाता है, जबकि यिडिश भाषा में इसे यार्मुल्के (Yarmulke) भी कहते हैं। आइए जानते हैं कि यहूदी क्यों पहनते हैं यह टोपी और इसका क्या महत्व है।
किप्पा क्या है?/Why Jews Wear Kippah
किप्पा एक छोटी, गोलाकार टोपी होती है जो सिर के ऊपरी हिस्से को ढकती है। यह आमतौर पर कपड़े, साटन, मखमल, ऊन या बुना हुआ होता है। कई बार इसमें डिजाइन, रंग या यहूदी चिह्न जैसे स्टार ऑफ डेविड भी बने होते हैं। हिब्रू भाषा में “किप्पा” का मतलब होता है “गुंबद” या “डोम” – क्योंकि यह सिर पर गुंबद की तरह फिट बैठती है।

यह टोपी बहुत हल्की और छोटी होती है, इसलिए इसे क्लिप, टेप या बालों में फंसाकर पहना जाता है ताकि गिरे नहीं। बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक इसे पहनते हैं, खासकर धार्मिक यहूदियों में।
यहूदी क्यों पहनते हैं सिर पर किप्पा?
यहूदी धर्म में सिर ढकने की परंपरा बहुत पुरानी है। यह बाइबिल में सीधे नहीं लिखा है, लेकिन तालमुद (यहूदी धार्मिक ग्रंथ) में इसका जिक्र मिलता है। मुख्य कारण है ईश्वर के प्रति सम्मान और श्रद्धा दिखाना।
तालमुद में कहा गया है कि व्यक्ति को हमेशा “स्वर्ग के भय” (यानी ईश्वर का डर) बना रहना चाहिए। सिर ढककर चलने से इंसान को याद रहता है कि उसके ऊपर कोई है – ईश्वर, जो हर काम देख रहा है। इससे व्यक्ति सही रास्ते पर चलता है और गलत कामों से बचता है।
एक कहानी में रब्बी हुना बेन जोशुआ का जिक्र है, जो कभी चार क्यूबिट (लगभग 6 फीट) से ज्यादा बिना सिर ढके नहीं चलते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि “दिव्य उपस्थिति” (शेखिना) उनके सिर के ऊपर है।
एक और कहानी रब्बी नचमन बार यित्जाक की है, जिनकी मां ने उन्हें बचपन से सिर ढकने की सलाह दी ताकि ईश्वर का भय बना रहे और वे गलत रास्ते पर न जाएं।
समय के साथ यह परंपरा इतनी मजबूत हो गई कि आज ज्यादातर ऑर्थोडॉक्स यहूदी पुरुष इसे हर समय पहनते हैं – सोते या नहाते समय छोड़कर। कुछ इसे सिर्फ प्रार्थना, टोरा पढ़ाई, आशीर्वाद या सिनागॉग में पहनते हैं।
किप्पा पहनना यहूदी पहचान का भी प्रतीक बन गया है। इससे व्यक्ति सार्वजनिक रूप से बताता है कि वह यहूदी है और अपनी आस्था पर गर्व करता है।
इजरायल में इसे किस नाम से जाना जाता है?
इजरायल में इस टोपी को मुख्य रूप से किप्पा ही कहा जाता है। हिब्रू भाषा में यही नाम इस्तेमाल होता है, क्योंकि “किप्पा” हिब्रू शब्द है। यिडिश भाषा (जो यूरोपीय यहूदियों में ज्यादा बोली जाती थी) में इसे यार्मुल्के कहते हैं, जिसका मतलब “राजा का भय” (यारे मल्का) भी माना जाता है – यानी ईश्वर (राजा) का सम्मान।
इजरायल में अलग-अलग समुदायों में किप्पा के रंग और स्टाइल अलग-अलग होते हैं। जैसे:
- काले मखमली किप्पा – ज्यादातर हारेदी या अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स में।
- रंग-बिरंगी बुनी हुई किप्पा – रिलिजियस जियोनिस्ट या मॉडर्न ऑर्थोडॉक्स में।
- साटन या कपड़े वाली – आमतौर पर।
कुछ जगहों पर बड़े सिर ढकने वाले हट जैसे स्ट्रेइमेल या स्पोडिक भी पहने जाते हैं, लेकिन रोजमर्रा में छोटी किप्पा ही सबसे आम है।
किप्पा का सांस्कृतिक और आधुनिक महत्व
आज किप्पा सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान भी है। इजरायल में स्कूल, सेना, अस्पताल – हर जगह यह दिखती है। गैर-यहूदी लोग जब सिनागॉग जाते हैं या यहूदी शादी/बार मित्ज्वाह में शामिल होते हैं, तो उन्हें भी किप्पा पहनने को कहा जाता है।
रिफॉर्म या कंजर्वेटिव यहूदियों में इसे वैकल्पिक माना जाता है – कुछ पहनते हैं, कुछ नहीं। महिलाएं भी कुछ समुदायों में पहनती हैं।










