Widowed Daughter In Law Maintenance SC : सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला! विधवा बहू को ससुर की संपत्ति से मिलेगा हक, चाहे पति की मौत बाद में हुई हो

Widowed Daughter In Law Maintenance SC : विधवा बहू के हक में सुप्रीम कोर्ट, ससुर की मौत के बाद भी संपत्ति से गुजारा भत्ता, मनुस्मृति का हवाला दिया

Widowed Daughter In Law Maintenance SC : 13 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें विधवा बहू के अधिकारों को मजबूत किया गया। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अगर किसी महिला के ससुर की मौत पहले हो जाती है और उसके बाद उसके पति की मौत होती है, तब भी वह महिला अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण (मेंटेनेंस) मांग सकती है। यह फैसला हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (HAMA) के तहत आया है। कोर्ट ने पुराने समय के मनुस्मृति ग्रंथ का भी हवाला दिया, ताकि समझाया जा सके कि परिवार में आश्रितों की देखभाल की जिम्मेदारी कितनी पुरानी और महत्वपूर्ण है।

मामला क्या था?

यह मामला बिहार से जुड़ा था। एक महिला ने शादी के बाद अपने ससुर के साथ रहना शुरू किया। ससुर की मौत हो गई, उसके बाद उसके पति की भी मौत हो गई। पति की मौत के बाद ससुराल पक्ष ने महिला को घर से निकाल दिया और ससुर की संपत्ति से कोई हिस्सा नहीं दिया। महिला ने फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण की मांग की, लेकिन फैमिली कोर्ट ने कहा कि चूंकि पति की मौत ससुर के बाद हुई, इसलिए वह ससुर की संपत्ति पर दावा नहीं कर सकती। हाई कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया और महिला के पक्ष में फैसला सुनाया। फिर ससुराल पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच (जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी) ने दोनों अपीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि समय का कोई फर्क नहीं पड़ता – विधवा बहू को आश्रित माना जाएगा।

कानून क्या कहता है?

हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 21 में आश्रितों की परिभाषा दी गई है। इसमें धारा 21(vii) कहती है कि “मृत हिंदू के पुत्र की कोई भी विधवा” (any widow of his son) आश्रित है। कोर्ट ने कहा कि यहां “कोई भी विधवा” लिखा है, मतलब पति की मौत कब हुई – पहले या बाद में – इसकी कोई शर्त नहीं है।

  • अगर ससुर जिंदा है, तो धारा 19 के तहत वह बहू का भरण-पोषण करता है।
  • ससुर की मौत के बाद, धारा 22 के तहत उसकी संपत्ति से विरासत पाने वाले (जैसे बेटे, पोते आदि) को आश्रितों का भरण-पोषण करना पड़ता है।

कोर्ट ने साफ कहा कि कानून की भाषा बहुत साफ है। इसे सीधे-सीधे पढ़ना चाहिए। अगर कोई बहू खुद को या अपने बच्चों को नहीं पाल सकती, और पति की संपत्ति से भी कुछ नहीं मिल रहा, तो ससुर की संपत्ति से मदद मिलनी चाहिए। समय का कोई मतलब नहीं – यह अधिकार विधवा होने के बाद भी बना रहता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर ऐसा नहीं माना गया, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और सम्मान के साथ जीने का अधिकार) का उल्लंघन होगा।

मनुस्मृति का हवाला, पुरानी सोच आज भी प्रासंगिक

फैसले में कोर्ट ने मनुस्मृति (अध्याय 8, श्लोक 389) का जिक्र किया:

“न माता न पिता न स्त्री न पुत्रस्त्यागमर्हति।
त्यजन्नपतितानेतान् राज्ञा दण्ड्यः शतानि षट ॥”

सरल अर्थ: मां, पिता, पत्नी और पुत्र को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। जो इन निर्दोष रिश्तेदारों को छोड़ देता है, उसे राजा 600 (यूनिट) का जुर्माना दे।

कोर्ट ने कहा कि यह श्लोक हजारों साल पुराना है, लेकिन इसका मतलब आज भी वही है – परिवार के मुखिया की जिम्मेदारी है कि वह अपनी बहू, बेटी जैसी आश्रित महिलाओं का ख्याल रखे। आज के भरण-पोषण कानून भी इसी सोच पर आधारित हैं। विरासत पाने वालों को उन लोगों की देखभाल करनी चाहिए, जो मृतक पर निर्भर थे।

यह हवाला इसलिए दिया गया ताकि समाज को याद दिलाया जाए कि महिलाओं के अधिकार नई चीज नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति में गहराई से जुड़े हैं।

फैसले का महत्व क्या है?

यह फैसला लाखों विधवा महिलाओं के लिए राहत की बात है, खासकर ग्रामीण इलाकों में जहां ससुराल वाले अक्सर विधवा बहू को घर से निकाल देते हैं। अब कानून साफ है – ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण का हक है, भले पति की मौत बाद में हुई हो।

  • महिलाएं अब आसानी से फैमिली कोर्ट में केस कर सकती हैं।
  • कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण की राशि तय करते समय महिला की जरूरतें, संपत्ति की स्थिति आदि देखी जाएंगी।
  • यह फैसला हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराता है और आगे के मामलों में मार्गदर्शन देगा।

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