Jharkhand Mithila Manch Calendar Release Ranchi: रांची में मिथिला संस्कृति का भव्य उत्सव: झारखंड मिथिला मंच का कैलेंडर विमोचन और पारिवारिक मिलन समारोह

Jharkhand Mithila Manch Calendar Release Ranchi: मिथिला समाज की एकता और परंपरा का प्रतीक बना यह आयोजन

Jharkhand Mithila Manch Calendar Release Ranchi: 28 दिसंबर 2025 को झारखंड की राजधानी रांची में मिथिला संस्कृति की खुशबू चारों तरफ फैल गई। अरगोड़ा तालाब के पास स्थित खूबसूरत लेक गार्डन मैरेज हॉल में झारखंड मिथिला मंच ने कैलेंडर और पंचांग का विमोचन किया, साथ ही एक बड़ा पारिवारिक मिलन समारोह आयोजित किया। यह कार्यक्रम इतना शानदार रहा कि मिथिला समाज के लोग इसे लंबे समय तक याद रखेंगे। मंच के अध्यक्ष डॉ. आनंद शेखर झा ने पूरे आयोजन की कमान संभाली और इसे सफल बनाया।

कार्यक्रम की शुरुआत कैलेंडर और पंचांग के विधिवत विमोचन से हुई। मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ, रांची के विधायक सीपी सिंह, हटिया के विधायक नवीन जायसवाल और अन्य गणमान्य लोग मौजूद थे। इन लोगों ने मिलकर कैलेंडर और पंचांग का लोकार्पण किया। यह कैलेंडर मिथिला समाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें मैथिली भाषा की परंपराएं, त्योहार और पंचांग की पूरी जानकारी होती है।

इस आयोजन में मिथिला समाज के करीब 1200 से ज्यादा लोग शामिल हुए। दूर-दूर से आए परिवारों ने एक साथ बैठकर पुरानी यादें ताजा कीं और नई दोस्तियां बनाईं। हॉल में हर तरफ उत्साह था। लोग एक-दूसरे से गले मिल रहे थे, हंस रहे थे और मिथिला की संस्कृति को जी रहे थे।

पारंपरिक व्यंजनों ने सबको लुभाया/Jharkhand Mithila Manch Calendar Release Ranchi

विमोचन के बाद शुरू हुआ पारिवारिक मिलन समारोह का असली मजा। यहां मिथिला की प्रसिद्ध मछली-भात की व्यवस्था थी, जिसे देखते ही सबकी मुंह में पानी आ गया। ताजी मछली की करी और गरमा-गरम चावल के साथ शाकाहारी व्यंजन भी परोसे गए। सबने भरपेट खाना खाया और मिथिला के स्वाद का आनंद लिया। मछली-भात तो मिथिला समाज की पहचान है, और इस कार्यक्रम में यह सबको बहुत पसंद आया। लोग कह रहे थे कि घर जैसा स्वाद मिल गया। खाने की मेजें हंसी-ठिठोली और बातचीत से गूंज रही थीं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई अपने तरीके से इस उत्सव में डूबा हुआ था।

सांस्कृतिक कार्यक्रम ने बांधा समां

खाने के बाद शुरू हुआ सांस्कृतिक कार्यक्रम, जो पूरे आयोजन की जान बना। सबसे पहले सियाराम झा सरस और डॉ. कृष्णमोहन झा ने मैथिली काव्य पाठ किया। उनकी कविताओं ने सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। मैथिली भाषा की मिठास और भावपूर्ण शब्दों ने हॉल में अलग ही माहौल बना दिया। कविताओं में मिथिला की मिट्टी, नदियां, त्योहार और प्रेम की बातें थीं, जो सुनने वालों के दिल को छू गईं।

फिर आए प्रख्यात गायक पंकज झा और स्निग्धा। इन दोनों ने विद्यापति के गीत और पारंपरिक मैथिली गायन पेश किया। विद्यापति के गीत तो राधा-कृष्ण की प्रेम कहानी बयां करते हैं, जो मिथिला संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। उनके गाने सुनकर पूरा सभागार झूम उठा। लोग भाव-विभोर हो गए, कुछ तो आंखें बंद करके गाने का मजा ले रहे थे। कुछ दर्शक खुद भी धीरे-धीरे गुनगुना रहे थे। यह प्रस्तुति इतनी खूबसूरत थी कि तालियों की गड़गड़ाहट लंबे समय तक चलती रही। सांस्कृतिक कार्यक्रम ने सबको यह एहसास कराया कि मिथिला की कला और संगीत आज भी कितने जीवंत हैं।

कैलेंडर का वितरण और समाज की एकजुटता

आयोजकों ने इस मौके पर 1200 से ज्यादा कैलेंडर और पंचांग मिथिला भाषा बोलने वालों के बीच बांटे। हर परिवार को एक-एक मिला, ताकि घर में मिथिला की परंपराएं जीवित रहें। लोग खुशी-खुशी इन्हें लेकर गए और कहा कि यह उनके लिए नए साल का सबसे अच्छा तोहफा है।

यह आयोजन सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि मिथिला समाज की एकता और सौहार्द का प्रतीक था। झारखंड में रहने वाले मिथिला मूल के लोग अक्सर अपनी जड़ों से जुड़ने के ऐसे मौके तलाशते हैं, और इस बार का समारोह ने उनकी यह इच्छा पूरी कर दी। डॉ. आनंद शेखर झा ने कहा कि ऐसे आयोजन से हमारी संस्कृति मजबूत होती है और नई पीढ़ी को अपनी विरासत का पता चलता है। मुख्य अतिथियों ने भी मंच की तारीफ की और कहा कि मिथिला की समृद्ध परंपरा को इस तरह जीवंत रखना बहुत जरूरी है।

कुल मिलाकर, यह कार्यक्रम सामाजिक सद्भाव, आपसी प्यार और सांस्कृतिक गौरव से भरा था। रांची जैसे शहर में जहां अलग-अलग संस्कृतियां मिलती-जुलती हैं, ऐसे आयोजन सबको एकजुट करते हैं और विविधता में एकता का संदेश देते हैं। मिथिला समाज के लोग घर लौटते समय खुश थे, उनके चेहरे पर संतोष था और मन में अगले साल फिर ऐसे मिलन की उम्मीद थी। 28 दिसंबर 2025 का यह दिन मिथिला संस्कृति के लिए एक यादगार और गर्व भरा दिन बन गया।

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