Khamenei Death Kintoor Village: खामेनेई की मौत से सदमे में बाराबंकी का किंतूर,यूपी की मिट्टी से जुड़ी थी ईरान की सुप्रीम लीडर की विरासत

Khamenei Death Kintoor Village: इजरायली हमले में खामेनेई शहीद, UP के किंतूर गांव में मचा मातम, पैतृक जड़ें यहीं से

Khamenei Death Kintoor Village: उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में बसा छोटा सा गांव किंतूर इन दिनों दुनिया की नजरों में है। ईरान के सर्वोच्च धार्मिक और राजनीतिक नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत की खबर ने इस गांव को गम में डुबो दिया है। इजरायल और अमेरिका के हमलों में खामेनेई की मौत की पुष्टि होने के बाद यहां सन्नाटा छा गया है। लोग टीवी और मोबाइल पर खबरें देखकर उदास बैठे हैं, आंखें नम हैं और दिलों में दर्द है। यह गांव दूर मध्य पूर्व में जल रही युद्ध की आग से हजारों किलोमीटर दूर है, लेकिन खामेनेई के साथ इसकी पुरानी पैतृक कड़ी ने इसे भी दुखी कर दिया है।

खामेनेई की मौत,इजरायल-ईरान युद्ध का नया मोड़/Khamenei Death Kintoor Village

ईरान और इजरायल के बीच लंबे समय से चल रहा तनाव अब पूरे युद्ध का रूप ले चुका है। हाल ही में इजरायल और अमेरिका ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए। इन हमलों में ईरान के कई महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाया गया। इसी दौरान तेहरान में अयातुल्लाह अली खामेनेई के कार्यालय पर हमला हुआ, जिसमें वे घायल हो गए और बाद में उनकी मौत हो गई। ईरान की सरकारी मीडिया ने इसकी पुष्टि की है। खामेनेई की उम्र 86 वर्ष थी। उनकी मौत के बाद ईरान में 40 दिनों का शोक घोषित किया गया है। दुनिया भर में इस घटना से राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। कई देशों ने शांति की अपील की है, लेकिन मध्य पूर्व में अस्थिरता और बढ़ गई है।

किंतूर गांव से जुड़ी खामेनेई की पैतृक जड़ें

किंतूर गांव बाराबंकी की सिरौली गौसपुर तहसील में घाघरा नदी के किनारे बसा है। यहां के बुजुर्ग बताते हैं कि अयातुल्लाह खामेनेई के पूर्वज इसी गांव से थे। खास तौर पर उनके दादा या परदादा सैयद अहमद मुसावी हिंदी का जन्म 18वीं-19वीं शताब्दी में इसी गांव में हुआ था। वे एक सम्मानित शिया विद्वान थे। उस समय यहां शिया इस्लामी शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र था। सैयद अहमद मुसावी हिंदी ने धार्मिक शिक्षा के लिए इराक के नजफ जाकर फिर ईरान में बस गए। परिवार ने अपनी भारतीय जड़ों को याद रखने के लिए नाम के साथ ‘हिंदी’ जोड़ा रहा। कई पीढ़ियों तक यह उपनाम चला।

किंतूर के लोग दावा करते हैं कि यह कड़ी इतनी मजबूत थी कि ईरान की इस्लामी क्रांति और उसके बाद की राजनीति में भी इसका असर रहा। हालांकि कुछ इतिहासकार कहते हैं कि खामेनेई का सीधा पैतृक संबंध खुमैनी से जुड़ा है, जिनके दादा किंतूर से थे, लेकिन गांव वाले इसे अपनी विरासत मानते हैं। यहां आज भी पुराने मकान और कुछ दस्तावेज मौजूद हैं, जो इस ऐतिहासिक रिश्ते की गवाही देते हैं। गांव में शिया समुदाय के लोग इस बात पर गर्व करते हैं कि उनकी मिट्टी से निकली एक शाखा ईरान तक पहुंची और वहां इतिहास रचा।

गांव में फैला गम, लोगों के बयान

खबर मिलते ही किंतूर में चारों तरफ सन्नाटा छा गया। लोग घरों में बैठकर टीवी देख रहे हैं। सैय्यद निहाल मियां ने आंसू पोछते हुए कहा, “यह सिर्फ ईरान का नहीं, पूरी दुनिया का नुकसान है। खामेनेई एक बड़े नेता थे, जिन्होंने ईरान को मजबूत बनाया। हमारी जड़ें उनसे जुड़ी हैं, इसलिए दुख ज्यादा है।”

एक और स्थानीय डॉ. रेहान काजमी ने कहा, “यह इतिहास का दर्दनाक पल है। गांव के लोग आपस में बैठकर पुरानी बातें याद कर रहे हैं। हम गर्व महसूस करते थे कि हमारा गांव इतने बड़े नेता से जुड़ा है, लेकिन आज यह दुख दे रहा है।”

गांव के युवा सोशल मीडिया पर खबरें शेयर कर रहे हैं। कई लोग कहते हैं कि युद्ध की आग दूर है, लेकिन उसका असर यहां तक पहुंच गया है। यहां के लोग साधारण जिंदगी जीते हैं – खेतीबाड़ी, छोटे-मोटे काम। लेकिन इस घटना ने उन्हें वैश्विक पटल पर ला दिया है।

वैश्विक प्रभाव और भारत का नजरिया

खामेनेई की मौत से ईरान में सत्ता परिवर्तन की चर्चा तेज हो गई है। इजरायल और अमेरिका के हमले जारी हैं। ईरान ने जवाबी कार्रवाई की है। पूरी दुनिया इस युद्ध पर नजर टिकाए है। भारत में भी इस खबर से चिंता है, क्योंकि मध्य पूर्व में अस्थिरता का असर तेल की कीमतों और सुरक्षा पर पड़ सकता है।

किंतूर गांव के लिए यह पल दोहरी भावनाओं वाला है। एक तरफ गर्व कि उनकी मिट्टी से जुड़ी विरासत इतनी ऊंचाई तक पहुंची, दूसरी तरफ गहरा दुख। गांव वाले कहते हैं, “हम शांति चाहते हैं। युद्ध किसी का भला नहीं करता।” यह छोटा गांव आज दुनिया को याद दिला रहा है कि इतिहास की जड़ें कितनी गहरी और दूर तक फैली हो सकती हैं।

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