फर्रुखाबाद जिले के राजेपुर क्षेत्र में 28 फरवरी को एक दर्दनाक घटना सामने आई। गांव राई के पास सरसों के खेत में एक नवजात बच्ची लावारिस हालत में मिली। खेत में काम कर रहे लोगों ने जब उसकी रोने की आवाज सुनी तो तुरंत पुलिस को सूचना दी।
पुलिस मौके पर पहुंची और बच्ची को बिना देर किए लोहिया अस्पताल के स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट में भर्ती कराया। बच्ची की हालत बहुत गंभीर थी क्योंकि उसका जन्म समय से पहले हुआ था और वजन भी काफी कम था।

48 दिनों तक चला इलाज लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ
अस्पताल में डॉक्टरों की टीम ने लगातार 48 दिनों तक बच्ची का इलाज किया। उसे हर संभव मेडिकल सपोर्ट दिया गया, लेकिन उसकी हालत बहुत धीरे-धीरे ही सुधर रही थी।
डॉक्टरों के अनुसार, बच्ची का शरीर पूरी तरह विकसित नहीं हुआ था। ऐसे मामलों में नवजात को विशेष देखभाल और लगातार गर्माहट की जरूरत होती है, लेकिन उसकी स्थिति लगातार नाजुक बनी रही और अंत में शुक्रवार शाम उसने दम तोड़ दिया।
कंगारू मदर केयर होती तो बच सकती थी जान
डॉक्टरों ने बताया कि ऐसे कमजोर नवजात बच्चों के लिए कंगारू मदर केयर बेहद जरूरी होती है। इसमें किसी महिला द्वारा बच्चे को अपने सीने से लगाकर रखा जाता है, जिससे उसे प्राकृतिक गर्माहट मिलती है और उसका विकास बेहतर होता है। यह तकनीक समय से पहले जन्मे बच्चों के लिए बहुत उपयोगी मानी जाती है, लेकिन इस मामले में यह सुविधा समय पर उपलब्ध नहीं हो सकी।
कागजों में उलझी रही व्यवस्था, नहीं पहुंचा जरूरी पत्र
स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही भी इस मामले में सामने आई है। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक के अनुसार, कंगारू मदर केयर की व्यवस्था के लिए एक पत्र भेजा गया था, लेकिन वह सही समय पर संबंधित कार्यालय तक नहीं पहुंचा। यदि यह पत्र समय पर पहुंच जाता तो जिला प्रशासन की मदद से बच्ची को यह सुविधा मिल सकती थी। लेकिन प्रक्रिया में देरी ने एक मासूम की जिंदगी छीन ली।
सिस्टम की लापरवाही पर उठे सवाल
इस घटना ने पूरे स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ डॉक्टर पूरी कोशिश कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक देरी ने जरूरी इलाज में बाधा डाली। लोगों का कहना है कि अगर समय पर कंगारू मदर केयर मिल जाती तो शायद बच्ची की जान बचाई जा सकती थी।
लोगों में नाराजगी और दुख का माहौल
घटना के बाद स्थानीय लोगों में गहरा दुख और नाराजगी है। लोग स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहे हैं और पूछ रहे हैं कि आखिर एक मासूम की जिंदगी इस तरह क्यों चली गई।
निष्कर्ष
फर्रुखाबाद की यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं बल्कि सिस्टम की खामियों का आईना है। एक मासूम बच्ची, जिसे सही समय पर देखभाल मिल सकती थी, वह प्रशासनिक लापरवाही और देरी का शिकार बन गई। यह घटना बताती है कि स्वास्थ्य सेवाओं में समय पर निर्णय और बेहतर समन्वय कितना जरूरी है।










