दलबदल कानून 2014 के बाद कब कब बना बड़ा मुद्दा

2014 के बाद दलबदल कानून पर क्यों मची सबसे ज्यादा बहस

भारत में दलबदल कानून (Anti-Defection Law) 1985 में लागू किया गया था। इसका मकसद था कि नेता बार-बार पार्टी बदलकर सरकारों को अस्थिर न करें। यह कानून संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल है। इसके अनुसार अगर कोई विधायक या सांसद अपनी पार्टी छोड़ देता है या पार्टी लाइन के खिलाफ वोट करता है, तो उसकी सदस्यता जा सकती है।

लेकिन इस कानून में एक अहम छूट भी है—अगर किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई विधायक या सांसद एक साथ दूसरी पार्टी में शामिल हो जाएं, तो इसे “विलय” माना जाता है और उन पर कार्रवाई नहीं होती।

इसी नियम के कारण 2014 के बाद कई बार यह कानून चर्चा में आया।

2014 के बाद कब-कब चर्चा में आया दलबदल कानून

  1. कर्नाटक संकट (2019)

2019 में कर्नाटक की कांग्रेस-जेडीएस सरकार गिर गई थी। कई विधायकों ने इस्तीफा दे दिया और बाद में बीजेपी में शामिल हो गए।
इस मामले में बड़ा सवाल उठा कि इस्तीफा देकर दलबदल कानून से बचा जा सकता है या नहीं। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ नेताओं को चुनाव लड़ने की अनुमति भी दी।

  1. मध्य प्रदेश सरकार गिरना (2020)

2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कई कांग्रेस विधायक बीजेपी में चले गए। इसके बाद कमलनाथ सरकार गिर गई।
यहां भी दलबदल कानून चर्चा में आया क्योंकि विधायकों ने पहले इस्तीफा दिया और फिर दूसरी पार्टी जॉइन की।

  1. राजस्थान सियासी संकट (2020)

राजस्थान में सचिन पायलट और उनके समर्थक विधायकों ने पार्टी के खिलाफ बगावत की।
मामला कोर्ट तक गया और दलबदल कानून की व्याख्या पर बहस हुई कि क्या असहमति जताना भी “दलबदल” है।

  1. महाराष्ट्र में बड़ी टूट (2022)

2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना के कई विधायक अलग हो गए और बीजेपी के साथ सरकार बना ली।
यह मामला इसलिए खास था क्योंकि इसमें दो-तिहाई विधायकों का समर्थन था, जिससे दलबदल कानून लागू नहीं हुआ।

  1. अन्य राज्यों में भी असर

गोवा, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भी कई बार विधायक दल बदलते रहे।
कई मामलों में पूरी पार्टी के विधायक दूसरी पार्टी में शामिल हो गए, जिससे दलबदल कानून लागू नहीं हुआ।

  1. हालिया मामला: राघव चड्ढा और AAP (2026)

हाल ही में आम आदमी पार्टी (AAP) के कुछ राज्यसभा सांसद, जिनमें राघव चड्ढा भी शामिल बताए जा रहे हैं, बीजेपी में शामिल हो गए।
खास बात यह है कि सांसदों की संख्या दो-तिहाई के करीब होने के कारण उन पर दलबदल कानून लागू नहीं होगा।

क्यों बार-बार विवाद में आता है यह कानून?

  1. loopholes (कमजोरियां)
  • इस्तीफा देकर दलबदल से बचना
  • दो-तिहाई नियम का इस्तेमाल
  1. स्पीकर की भूमिका

दलबदल पर फैसला विधानसभा या संसद के स्पीकर लेते हैं, लेकिन कई बार उन पर पक्षपात के आरोप लगते हैं।

  1. लोकतंत्र बनाम पार्टी अनुशासन

यह कानून पार्टी को मजबूत बनाता है, लेकिन विधायक की स्वतंत्र सोच को सीमित कर देता है।

निष्कर्ष

दलबदल कानून का उद्देश्य राजनीति में स्थिरता लाना था, लेकिन 2014 के बाद के घटनाक्रम बताते हैं कि नेता नए-नए तरीके खोज लेते हैं।
कभी इस्तीफा, कभी सामूहिक विलय—इन सबके जरिए कानून को चुनौती मिलती रहती है।

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