झारखंड में 7 सितंबर को हूल उलगुलान, प्रखंड मुख्यालयों पर धरना; MMDR संशोधन विधेयक वापस लेने की मांग

खनिज संपदा पर राज्यों के अधिकारों का मुद्दा गरमाया, राष्ट्रपति से संवैधानिक हस्तक्षेप की अपील; सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले का दिया हवाला

MMDR Amendment Bill 2026: खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर झारखंड में विरोध की तैयारी तेज हो गई है। प्रस्तावित विधेयक के खिलाफ 7 सितंबर को राज्य के सभी प्रखंड मुख्यालयों पर ‘हूल उलगुलान’ के तहत धरना-प्रदर्शन करने का आह्वान किया गया है। आंदोलनकारियों की मुख्य मांग केंद्र सरकार से विधेयक को वापस लेने की है।

खनिज राज्यों के अधिकारों को लेकर उठाए सवाल

आंदोलन से जुड़े पक्षों का कहना है कि झारखंड जैसे खनिज संपदा वाले राज्यों के लिए खनिज संसाधन केवल प्राकृतिक संपत्ति नहीं हैं, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था और विकास योजनाओं के लिए राजस्व का बड़ा आधार हैं। ऐसे में खनिजों से जुड़े अधिकारों में किसी भी बदलाव का सीधा असर राज्यों की वित्तीय क्षमता पर पड़ सकता है।

राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग

विधेयक को लेकर महामहिम राष्ट्रपति के समक्ष हस्तक्षेप मांग-पत्र रखने की बात कही गई है। इसमें केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक शक्तियों के बंटवारे का हवाला देते हुए कहा गया है कि राज्यों के वित्तीय एवं विधायी अधिकारों को प्रभावित करने वाले प्रावधानों की गंभीर समीक्षा जरूरी है।

मांग-पत्र में राष्ट्रपति से मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर विचार करने का आग्रह किया गया है—

  • विधेयक के उन प्रावधानों की संवैधानिक समीक्षा हो, जिनका असर राज्यों के खनिज संबंधी कराधान अधिकारों पर पड़ सकता है।
  • झारखंड (Jharkhand) सहित खनिज बहुल राज्यों की सरकारों और संबंधित पक्षों से व्यापक विचार-विमर्श कराया जाए।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया गया हवाला

विरोध करने वालों ने 25 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा Mineral Area Development Authority बनाम Steel Authority of India मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया है। उनका तर्क है कि अदालत ने रॉयल्टी को कर नहीं माना और राज्य सूची की प्रविष्टि 50 के तहत राज्यों की खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति को मान्यता दी।

इसी आधार पर उनका कहना है कि संसद की खनिजों के विकास एवं विनियमन से जुड़ी शक्ति और राज्यों की कराधान शक्ति को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता।

Entry 54 और Entry 50 को लेकर संवैधानिक बहस

मांग-पत्र में संविधान की संघ सूची की प्रविष्टि 54 का जिक्र करते हुए कहा गया है कि संसद को खनिजों के विकास और विनियमन के संबंध में कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है। दूसरी ओर राज्य सूची की प्रविष्टि 50 राज्यों के खनिज अधिकारों पर कराधान से संबंधित है।

आंदोलनकारियों का कहना है कि विनियमन के नाम पर राज्यों को संविधान से मिले कराधान अधिकारों के प्रभावी इस्तेमाल से रोकने वाला कोई भी प्रावधान संवैधानिक कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

झारखंड के राजस्व और विकास पर असर की चिंता

झारखंड में कोयला, लौह-अयस्क समेत कई महत्वपूर्ण खनिज संसाधन मौजूद हैं। राज्य के पक्ष में यह तर्क रखा जा रहा है कि खनिजों से मिलने वाला राजस्व सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और दूसरी विकास योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण है।

इसलिए खनिज राजस्व से जुड़े अधिकारों में बदलाव को केवल खनन नीति का विषय न मानकर राज्य की वित्तीय स्वायत्तता और संघीय व्यवस्था से जोड़कर देखने की मांग की जा रही है।

पूर्वव्यापी प्रभाव पर भी उठे सवाल

मांग-पत्र में विधेयक के संभावित पूर्वव्यापी प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई गई है। तर्क दिया गया है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राज्यों के अधिकारों को लेकर जो कानूनी स्थिति सामने आई है, उसके बाद किसी नए केंद्रीय कानून से उन अधिकारों को प्रभावित किया जाता है तो उसके संवैधानिक प्रभाव की विस्तृत जांच आवश्यक होगी।

सरकार से समीक्षा और स्पष्टीकरण की मांग

आंदोलनकारियों ने राष्ट्रपति से यह भी आग्रह किया है कि केंद्र सरकार से विधेयक के विवादित प्रावधानों पर विस्तृत स्पष्टीकरण लिया जाए। साथ ही राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता, संघीय ढांचे और संविधान में निर्धारित अधिकारों के संतुलन को ध्यान में रखते हुए आगे की कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग की गई है।

7 सितंबर के आंदोलन का मुख्य मुद्दा

‘हूल उलगुलान’ के जरिए आंदोलनकारी केंद्र सरकार पर विधेयक वापस लेने का दबाव बनाने की तैयारी में हैं। उनका कहना है कि खनिज संपदा पर राज्यों के संवैधानिक अधिकार सुरक्षित रहने चाहिए और किसी भी विवादित प्रावधान को संवैधानिक समीक्षा के बिना लागू नहीं किया जाना चाहिए।

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