Bokaro Thermal: स्वाद के साथ सेहत का मेल कैसा हो, इसका जीवंत उदाहरण शुक्रवार को केंद्रीय विद्यालय बोकारो थर्मल में देखने को मिला। पोषण माह के अवसर पर आयोजित पौष्टिक व्यंजन प्रदर्शनी में विद्यार्थियों ने झारखंड की पारंपरिक खानपान संस्कृति को नए अंदाज में प्रस्तुत किया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों के बीच स्वास्थ्य, संतुलित आहार और पारंपरिक खान-पान के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना था।
प्रदर्शनी के मुख्य आकर्षण

झारखंड की पारंपरिक संस्कृति की झलक: विद्यार्थियों ने झारखंड के पारंपरिक और पौष्टिक व्यंजनों को बड़े उत्साह के साथ प्रदर्शित किया। प्रदर्शनी में विशेष रूप से लिट्टी-चोखा, धुस्का, छिलका रोटी, आड़सा, और मड़ुआ (रागी) से बने विभिन्न स्वास्थ्यवर्धक व्यंजन आकर्षण का केंद्र रहे।
फल, अंकुरित अनाज और मिलेट्स ने भी खींचा ध्यान
व्यंजन प्रदर्शनी में केवल पारंपरिक पकवान ही नहीं, बल्कि रोजमर्रा के पौष्टिक खाद्य पदार्थों को भी जगह दी गई। विद्यार्थियों ने मौसमी फलों, अंकुरित अनाज, ताजी सलाद और श्रीअन्न से तैयार व्यंजनों को आकर्षक ढंग से सजाया। बच्चों ने इन खाद्य पदार्थों में मौजूद विटामिन, प्रोटीन और खनिज तत्वों की उपयोगिता के बारे में जानकारी साझा की। प्रदर्शनी के जरिए यह समझाने की कोशिश की गई कि भोजन में विविधता रखने और पौष्टिक विकल्प चुनने से शरीर को जरूरी पोषक तत्व मिल सकते हैं।
शिक्षकों के मार्गदर्शन में विद्यार्थियों ने संभाली जिम्मेदारी
कार्यक्रम की खास बात यह रही कि विद्यार्थियों ने केवल व्यंजन तैयार कर उन्हें प्रदर्शित नहीं किया, बल्कि उनके बारे में जानकारी भी दी। शिक्षकों के मार्गदर्शन में लगाए गए स्टॉल पर बच्चों ने आगंतुकों को खाद्य पदार्थों की विशेषताओं और उनके स्वास्थ्य संबंधी लाभों से भी परिचित कराया। इस गतिविधि से विद्यार्थियों को पोषण के बारे में व्यावहारिक जानकारी हासिल करने और अपनी बात आत्मविश्वास के साथ रखने का अवसर मिला।
जंक फूड की बढ़ती आदत पर प्राचार्य ने जताई चिंता
विद्यालय के प्राचार्य डॉ. बीआर डे ने विद्यार्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों को संबोधित करते हुए संतुलित आहार की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आजकल बच्चे जंक फूड और फास्ट फूड की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। ऐसी आदतों के बीच घर के पौष्टिक भोजन और पारंपरिक व्यंजनों की अहमियत समझना जरूरी है। उन्होंने कहा कि झारखंड के लिट्टी-चोखा, मड़ुआ और धुस्का जैसे व्यंजन स्थानीय खानपान की समृद्ध परंपरा को दर्शाते हैं। इस तरह के आयोजन बच्चों को अपनी संस्कृति से जोड़ने के साथ बेहतर खानपान की आदतें विकसित करने में भी मदद करते हैं।
स्वस्थ जीवनशैली अपनाने का दिया संदेश
प्रदर्शनी के समापन पर स्वस्थ और पारंपरिक खानपान को दैनिक जीवन में महत्व देने का संकल्प लिया गया। आयोजन ने यह संदेश दिया कि पौष्टिक भोजन के लिए हमेशा महंगे या नए विकल्पों पर निर्भर रहना जरूरी नहीं है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध अनाज, मौसमी फल, सब्जियां और पारंपरिक व्यंजन भी संतुलित आहार का हिस्सा बन सकते हैं। केंद्रीय विद्यालय बोकारो थर्मल की यह पहल पोषण के प्रति जागरूकता बढ़ाने और विद्यार्थियों में स्वस्थ जीवनशैली की समझ विकसित करने की दिशा में उपयोगी रही।










