Sarhul : बोकारो थर्मल में सरहुल पर्व का उल्लास देखते ही बन रहा है। कोयलांचल का यह इलाका आज पूरी तरह प्रकृति और परंपरा के रंग में डूबा नजर आया। सखुआ के पेड़ों पर खिले नए फूल जहां नए जीवन का संकेत दे रहे हैं, वहीं मांदर की गूंज पूरे क्षेत्र में उत्साह भर रही है। हर ओर नाच-गान और खुशियों का माहौल है, जैसे प्रकृति खुद जश्न मना रही हो।
सरना स्थलों पर पूजा, प्रकृति को प्रणाम
सुबह होते ही विभिन्न सरना स्थलों पर पूजा-अर्चना का दौर शुरू हो गया। पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पहान और पुजारियों ने विधिवत पूजा कर प्रकृति के प्रति आभार जताया। इस दौरान लोगों ने सखुआ के फूलों को माथे से लगाकर सुख-समृद्धि और अच्छे वर्ष की कामना की।

झांकियों में झलकी परंपरा की खूबसूरती
सिक्स यूनिट, आमों और नावाडीह क्षेत्रों से निकली झांकियों ने पूरे शहर का ध्यान अपनी ओर खींचा। पारंपरिक वेशभूषा में सजे युवक-युवतियां और महिलाएं मांदर की थाप पर थिरकते हुए नगर भ्रमण पर निकले। ढोल-नगाड़ों और लोकगीतों की धुन पर हर कोई झूमता नजर आया। यह दृश्य सिर्फ एक जुलूस नहीं बल्कि सदियों पुरानी संस्कृति का जीवंत प्रदर्शन था।
सरहुल का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व
सरहुल केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के रिश्ते का प्रतीक है। आदिवासी मान्यता के अनुसार इस दिन धरती और सूर्य का विवाह होता है। इसके बाद ही नई फसल और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग शुरू किया जाता है। यह पर्व हमें प्रकृति के प्रति सम्मान और संतुलन बनाए रखने का संदेश देता है।
कोयलांचल में उत्सव जैसा माहौल
पूरा बोकारो थर्मल आज उत्सव में डूबा नजर आया। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इस पर्व में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते दिखे। गांव से लेकर शहर तक हर गली में उत्साह और उमंग का माहौल है। लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं दे रहे हैं और पारंपरिक पकवानों का आनंद ले रहे हैं।










