Justice Yashwant Varma Impeachment: महाभियोग मामले में जस्टिस यशवंत वर्मा को बड़ा झटका, SC ने स्पीकर की कमेटी के खिलाफ याचिका खारिज कर दी

Justice Yashwant Varma Impeachment: इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। 16 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित जांच कमेटी की वैधता को चुनौती दी थी। यह कमेटी उनके खिलाफ महाभियोग की जांच कर रही है। जस्टिस वर्मा पर आरोप है कि उनके दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास पर बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी मिली थी। यह मामला मार्च 2025 में सामने आया था, जब उनके घर में आग लग गई और दमकलकर्मियों ने आग बुझाते समय आधे जले नोटों के बंडल पाए। उस समय जस्टिस वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट के जज थे।

घटना के बाद काफी हंगामा हुआ। लोग सवाल उठाने लगे कि इतनी बड़ी रकम जज के घर में कैसे आई और वह आग कैसे लगी। पुलिस और फायर ब्रिगेड की रिपोर्ट में कहा गया कि नोट जले हुए थे, लेकिन रकम काफी बड़ी थी। इस मामले ने न्यायपालिका की साख पर सवाल खड़े कर दिए। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने इन-हाउस जांच शुरू की। जांच में जस्टिस वर्मा को इस्तीफा देने या महाभियोग का सामना करने का विकल्प दिया गया। जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया।

महाभियोग प्रस्ताव और संसदीय प्रक्रिया/Justice Yashwant Varma Impeachment

21 जुलाई 2025 को लोकसभा और राज्यसभा में जस्टिस वर्मा के खिलाफ अलग-अलग महाभियोग प्रस्ताव पेश किए गए। ये प्रस्ताव भ्रष्टाचार और आचरण के खिलाफ थे। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और जजेस (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत तीन सदस्यीय जांच कमेटी गठित की। कमेटी में जस्टिस अमित कुमार, जस्टिस मनींदर मोहन श्रीवास्तव और बीबी आचार्य जैसे सदस्य शामिल हैं।

राज्यसभा में डिप्टी चेयरमैन ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। जस्टिस वर्मा की दलील थी कि दोनों सदनों में प्रस्ताव एक साथ स्वीकार होना चाहिए, तभी कमेटी बन सकती है। उन्होंने कहा कि लोकसभा स्पीकर ने एकतरफा फैसला लिया, जो कानून के खिलाफ है। उन्होंने याचिका में कमेटी को भंग करने और महाभियोग प्रक्रिया रोकने की मांग की।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2025 में याचिका पर सुनवाई शुरू की। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने मामले की सुनवाई की। जस्टिस वर्मा की तरफ से कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ वकील पेश हुए। उन्होंने तर्क दिया कि जजेस इन्क्वायरी एक्ट के सेक्शन 3(2) के मुताबिक, दोनों सदनों की सहमति जरूरी है। राज्यसभा ने प्रस्ताव खारिज किया, तो लोकसभा अकेले कमेटी नहीं बना सकती।

कोर्ट ने 8 जनवरी 2026 को फैसला सुरक्षित रख लिया था। 16 जनवरी को फैसला सुनाते हुए बेंच ने याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि स्पीकर ने कोई गैर-कानूनी काम नहीं किया। प्रक्रिया में कोई बड़ी गड़बड़ी नहीं है। राज्यसभा डिप्टी चेयरमैन के फैसले को चुनौती नहीं दी गई, इसलिए लोकसभा की कमेटी वैध है। कोर्ट ने साफ कहा कि यह प्रक्रियागत मुद्दा है और इसमें हस्तक्षेप की जरूरत नहीं।

जस्टिस वर्मा पर क्या असर पड़ेगा

यह फैसला जस्टिस वर्मा के लिए बड़ा झटका है। अब जांच कमेटी अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी। अगर रिपोर्ट में आरोप साबित हुए, तो महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। महाभियोग के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए। अगर महाभियोग पास हुआ, तो जस्टिस वर्मा को पद से हटाया जा सकता है।

यह मामला न्यायपालिका की स्वच्छता और जवाबदेही पर सवाल उठाता है। जजों के खिलाफ महाभियोग बहुत दुर्लभ है। भारत में अब तक किसी जज का महाभियोग सफल नहीं हुआ है। यह घटना दिखाती है कि उच्च न्यायालय के जज भी जांच के दायरे में आ सकते हैं।

समाज और कानूनी विशेषज्ञों की राय

कई कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही है, क्योंकि संसद की प्रक्रिया में ज्यादा हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। दूसरी तरफ, कुछ का मानना है कि जजों की सुरक्षा के लिए और सख्त प्रक्रिया होनी चाहिए। यह मामला भविष्य में ऐसे अन्य मामलों के लिए मिसाल बनेगा।

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