ओडिशा में लागू होगा UCC? अमित शाह के बयान के बाद सरकार ने तेज की तैयारी, समिति करेगी मंथन

Odisha UCC: विवाह, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े कानूनों में आ सकता है बदलाव; आदिवासी परंपराओं को लेकर सरकार के सामने बड़ी चुनौती

Odisha UCC: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के 2029 तक भाजपा शासित 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता यानी UCC लागू करने के लक्ष्य वाले बयान के बाद ओडिशा में भी इस दिशा में गतिविधियां बढ़ने की चर्चा है। राज्य सरकार शुरुआती स्तर पर इसकी संभावनाओं और कानूनी पहलुओं को खंगालने की तैयारी कर सकती है। इसके लिए विधि विभाग को नोडल जिम्मेदारी मिलने की संभावना जताई जा रही है।

विशेषज्ञों की समिति बनाएगी आगे की राह

सरकार यूसीसी के संभावित स्वरूप को समझने के लिए विशेषज्ञों की समिति गठित कर सकती है। यह समिति देश के अलग-अलग हिस्सों में लागू या प्रस्तावित व्यक्तिगत कानूनों का अध्ययन करने के साथ संविधान, सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों और उत्तराखंड के यूसीसी मॉडल का भी परीक्षण कर सकती है। इसके बाद ओडिशा की सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सुझाव तैयार किए जा सकते हैं।

सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को मिल सकती है अहम भूमिका

संभावित समिति में पांच से छह सदस्य रखे जाने की चर्चा है। इसकी कमान सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश को दी जा सकती है। इसके अलावा हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी, सामाजिक क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ और विधि विभाग के अधिकारी भी समिति का हिस्सा हो सकते हैं। जरूरत के अनुसार सदस्यों की संख्या बढ़ाने का विकल्प भी सरकार के पास रहेगा।

शादी और तलाक के लिए एक कानून पर जोर

यूसीसी का मूल उद्देश्य अलग-अलग धर्मों में लागू व्यक्तिगत कानूनों की जगह नागरिक मामलों में एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है। प्रस्तावित व्यवस्था में विवाह का अनिवार्य पंजीकरण, एक से अधिक विवाह पर रोक, तलाक के आधार और प्रक्रिया को लेकर समान नियम जैसे मुद्दे शामिल हो सकते हैं। भरण-पोषण और तलाक के बाद पति-पत्नी के अधिकार भी इसके दायरे में आ सकते हैं।

बेटियों के संपत्ति अधिकार पर भी नजर

समान नागरिक संहिता के तहत उत्तराधिकार और संपत्ति के नियमों में भी बदलाव की संभावना रहती है। जमीन, मकान और पैतृक संपत्ति में बेटियों को बेटों के बराबर अधिकार देने से जुड़े प्रावधानों पर विचार किया जा सकता है। पति-पत्नी के संपत्ति अधिकार और बच्चों के उत्तराधिकार से जुड़े नियमों को भी एक समान ढांचे में लाने की कोशिश हो सकती है।

गोद लेने और बच्चों के अधिकारों पर बन सकते हैं समान नियम

दत्तक ग्रहण भी यूसीसी के महत्वपूर्ण विषयों में शामिल हो सकता है। अलग-अलग समुदायों में मौजूद प्रावधानों की जगह एक समान व्यवस्था तैयार करने पर विचार किया जा सकता है। इसके तहत जैविक और दत्तक बच्चों के अधिकारों को समान कानूनी सुरक्षा देने से जुड़े प्रावधान बनाए जाने की संभावना है।

लिव-इन रिलेशनशिप भी बन सकता है बड़ा मुद्दा

लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर भी प्रस्तावित कानून में प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं। इसमें ऐसे संबंधों के पंजीकरण, उन्हें समाप्त करने की प्रक्रिया और उनसे जन्म लेने वाले बच्चों के अधिकारों को लेकर स्पष्ट नियम बनाने पर विचार संभव है। हालांकि इस विषय पर अंतिम व्यवस्था विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों और सरकार के फैसले पर निर्भर करेगी।

आदिवासी समुदायों की परंपराएं सबसे बड़ी चुनौती

ओडिशा में यूसीसी को लेकर सबसे संवेदनशील सवाल जनजातीय समुदायों से जुड़ा है। राज्य में बड़ी संख्या में आदिवासी आबादी रहती है और विभिन्न समुदायों की विवाह, उत्तराधिकार और संपत्ति को लेकर अपनी पारंपरिक व्यवस्थाएं हैं। इसलिए सरकार के सामने यह तय करना अहम होगा कि इन समुदायों को यूसीसी से छूट मिलेगी या उनकी परंपराओं को ध्यान में रखते हुए अलग प्रावधान बनाए जाएंगे।

कानून बनने से पहले कई प्रक्रिया से गुजरना होगा

विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के बाद संभावित विधेयक का मसौदा तैयार किया जा सकता है। इसके बाद जनता और संबंधित पक्षों से सुझाव लेने, मसौदे में बदलाव करने और उसे मंत्रिमंडल के सामने रखने की प्रक्रिया शुरू होगी। कैबिनेट की मंजूरी के बाद विधेयक विधानसभा में पेश किया जाएगा।

राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद लागू होगा कानून

विधानसभा से पारित होने के बाद विधेयक राज्यपाल के माध्यम से राष्ट्रपति के पास भेजा जा सकता है। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद ही राज्य में इसे लागू करने का रास्ता साफ होगा। फिलहाल उत्तराखंड भाजपा शासित राज्यों में यूसीसी लागू करने वाला पहला राज्य है, जबकि अन्य राज्यों में प्रक्रिया अलग-अलग चरणों में चल रही है। ओडिशा में समिति का गठन कब होगा और कानून कब तक लागू होगा, इसकी आधिकारिक समयसीमा अभी सामने नहीं आई है।

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