Trump Greenland NATO Troops: का ग्रीनलैंड प्लान फेल? NATO ने चली धमाकेदार चाल, 6 देशों की सेना अचानक पहुंची।

Trump Greenland NATO Troops: ट्रंप को झटका, ग्रीनलैंड पर NATO ने दिखाई ताकत, 6 देशों की सेना अचानक पहुंच गई – वजह क्या?

Trump Greenland NATO Troops: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर जो बड़ा प्लान बनाया है, उसने पूरी दुनिया में तनाव पैदा कर दिया है। ट्रंप बार-बार कह रहे हैं कि ग्रीनलैंड अमेरिका की सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है और इसे अमेरिका के पास होना चाहिए। लेकिन इस प्लान के जवाब में NATO ने एकदम से ऐसा कदम उठाया है कि सब हैरान हैं। अचानक 6 NATO देशों की सेनाएं ग्रीनलैंड पहुंच गई हैं। यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं है, बल्कि ट्रंप को सीधा चेतावनी देने जैसा कदम है। आइए समझते हैं पूरी कहानी और वजह क्या है।

ट्रंप का ग्रीनलैंड प्लान क्या है?/Trump Greenland NATO Troops

ट्रंप ने अपनी पहली पारी में 2019 में ही ग्रीनलैंड को खरीदने या कंट्रोल में लेने की बात की थी। तब डेनमार्क ने साफ मना कर दिया था। अब 2026 में ट्रंप की दूसरी टर्म शुरू होते ही यह मुद्दा फिर गरमा गया है। ट्रंप का कहना है कि ग्रीनलैंड आर्कटिक क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण जगह है। यहां से अमेरिका रूस और चीन की हरकतों पर नजर रख सकता है। इसके अलावा ग्रीनलैंड में खनिज, तेल और गैस के बड़े भंडार हैं, जो क्लाइमेट चेंज के कारण अब आसानी से निकाले जा सकते हैं।

ट्रंप ने कई बार कहा है कि अगर ग्रीनलैंड अमेरिका के पास नहीं आया तो यह बहुत बड़ी समस्या होगी। उन्होंने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ने पर मिलिट्री ऑप्शन भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यह बात डेनमार्क और ग्रीनलैंड के लिए बहुत गंभीर है क्योंकि ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है, लेकिन वहां के लोग खुद को स्वतंत्र मानते हैं और NATO का सदस्य भी हैं। ट्रंप का यह प्लान NATO के सबसे बड़े नियम को चुनौती देता है – आर्टिकल 5, जो कहता है कि किसी एक सदस्य देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा।

NATO की भयंकर चाल: 6 देशों की सेना पहुंची

ट्रंप के बयानों से NATO में हड़कंप मच गया। NATO के सेक्रेटरी जनरल ने साफ कहा कि ग्रीनलैंड की सुरक्षा NATO ही तय करेगा, कोई और नहीं। इसके जवाब में डेनमार्क ने ग्रीनलैंड में अपनी मिलिट्री ताकत बढ़ाने का फैसला किया। लेकिन असली चाल यह थी कि अचानक 6 NATO देशों की सेनाएं ग्रीनलैंड पहुंच गईं।

ये देश हैं – फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन, नॉर्वे, ब्रिटेन और इटली। इन देशों के सैनिक, जहाज और एयरक्राफ्ट ग्रीनलैंड के अलग-अलग इलाकों में तैनात हो गए हैं। यह सब एक बड़े मिलिट्री एक्सरसाइज के नाम पर हुआ है, लेकिन सबको पता है कि यह ट्रंप को जवाब देने का तरीका है। फ्रांस ने अपने सैनिकों को सबसे पहले भेजा, जर्मनी ने भी दर्जनों सैनिक भेजे। नॉर्वे और स्वीडन, जो आर्कटिक के नजदीक हैं, उन्होंने भी फुल सपोर्ट दिया। ब्रिटेन और इटली ने भी अपनी यूनिट्स शामिल कीं।

यह तैनाती ठीक उसी समय हुई जब अमेरिका में डेनमार्क और ग्रीनलैंड के प्रतिनिधियों से मीटिंग चल रही थी। यह एक साफ मैसेज था – NATO एकजुट है और ग्रीनलैंड पर कोई दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं करेगा।

वजह क्या है? आर्कटिक में नई जंग शुरू

ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है और आर्कटिक महासागर के बीच में स्थित है। क्लाइमेट चेंज की वजह से यहां की बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं और खनिज निकालना आसान हो गया है। रूस और चीन भी आर्कटिक में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। ट्रंप का कहना है कि अमेरिका को ग्रीनलैंड चाहिए ताकि वह इस क्षेत्र में आगे रहे।

लेकिन NATO इसे अपनी एकता का सवाल मानता है। अगर अमेरिका किसी NATO सदस्य पर दबाव डालता है या हमला करता है, तो पूरा अलायंस खतरे में पड़ सकता है। डेनमार्क ने पहले से ही आर्कटिक में अपनी डिफेंस बढ़ाने के लिए अरबों यूरो खर्च करने का प्लान बनाया था। अब ट्रंप के दबाव से NATO ने और तेजी दिखाई है।

ग्रीनलैंड के लोग क्या सोच रहे हैं?

ग्रीनलैंड के लोग डरे हुए हैं। वहां की आबादी बहुत कम है, सिर्फ 56 हजार के आसपास। कई लोग कह रहे हैं कि वे अमेरिका के साथ नहीं जाना चाहते। ग्रीनलैंड के नेता बार-बार कह रहे हैं कि उनका द्वीप उनके लोगों का है और कोई जबरदस्ती नहीं चलेगी। कुछ लोग तो कह रहे हैं कि अगर हालात बिगड़े तो वे अपना घर छोड़कर भागने की सोच रहे हैं।

निष्कर्ष

यह तनाव NATO और अमेरिका के रिश्तों की सबसे बड़ी परीक्षा है। अगर ट्रंप पीछे नहीं हटे तो ट्रांसअटलांटिक रिश्ते टूट सकते हैं। दूसरी तरफ डेनमार्क और NATO ने साफ कर दिया है कि वे ग्रीनलैंड की रक्षा के लिए तैयार हैं। फिलहाल 6 देशों की सेना की मौजूदगी से स्थिति कंट्रोल में लग रही है, लेकिन ट्रंप की अगली चाल क्या होगी, यह देखना बाकी है।

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