Trump H-1B Visa Policy Under Fire: ट्रंप की बढ़ीं मुश्किलें! H-1B वीज़ा शुल्क पर 19 राज्यों की कोर्ट में चुनौती

Trump H-1B Visa Policy Under Fire: डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ 19 राज्यों का कानूनी मोर्चा, H-1B Visa फीस पर बवाल,

Trump H-1B Visa Policy Under Fire: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (US President Donald Trump) के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के साथ ही उनकी नीतियां लगातार कानूनी घेरे में आती जा रही हैं। अब इमीग्रेशन नीति को लेकर ट्रंप प्रशासन की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। H-1B वीजा (H-1B Visa) पर प्रस्तावित $1,00,000 की भारी शुल्क वृद्धि के खिलाफ अमेरिका के 19 राज्यों ने अदालत का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया है। डेमोक्रेटिक शासित राज्यों का आरोप है कि यह नीति न सिर्फ कानून के खिलाफ है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और रिसर्च जैसे अहम क्षेत्रों को भी गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है। यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब अमेरिका में विदेशी टैलेंट की भूमिका लगातार बढ़ रही है। आखिर यह मामला क्या है, कोर्ट में क्या दलीलें दी जाएंगी और आगे क्या हो सकता है चलिए जानते हैं…

H-1B वीजा विवाद क्या है?/Trump H-1B Visa Policy Under Fire

जनवरी में डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के बाद से ही उनके प्रशासन और डेमोक्रेटिक राज्यों के बीच टकराव बढ़ता गया है। खासतौर पर इमीग्रेशन नीतियों को लेकर लगातार कानूनी विवाद सामने आ रहे हैं। H-1B वीजा प्रोग्राम अमेरिकी नियोक्ताओं को विशेषज्ञ पेशों के लिए विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति की अनुमति देता है, जिनमें इंजीनियर, डॉक्टर, शिक्षक और शोधकर्ता शामिल हैं। ट्रंप प्रशासन द्वारा इस वीजा पर $1,00,000 शुल्क लगाने के फैसले को राज्यों ने असंवैधानिक करार दिया है। उनका कहना है कि इससे सार्वजनिक संस्थानों और जरूरी सेवाओं में कर्मचारियों की भारी कमी हो सकती है, जिससे आम जनता सीधे प्रभावित होगी।

19 राज्यों का बड़ा कानूनी पेंच

कैलिफोर्निया (California), न्यूयॉर्क (New York), इलिनॉयस (Illinois) सहित कुल 19 राज्यों ने इस नीति को अदालत में चुनौती देने का फैसला किया है। कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल रॉब बांटा (Attorney General Rob Bonta) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर कहा कि ट्रंप का नया H-1B शुल्क शिक्षकों, चिकित्सकों, नर्सों और शोधकर्ताओं की भर्ती में बड़ी बाधा बनेगा। उनके अनुसार यह नीति स्कूलों, अस्पतालों और विश्वविद्यालयों की कार्यक्षमता को कमजोर कर सकती है। राज्यों का दावा है कि यह शुल्क वास्तविक प्रशासनिक लागत से कई गुना अधिक है और इसका उद्देश्य इमीग्रेशन को हतोत्साहित करना है, न कि सिस्टम को बेहतर बनाना।

जांच और कानूनी दलीलें

रॉयटर्स (Reuters) की रिपोर्ट के मुताबिक यह मुकदमा शुक्रवार को मैसाचुसेट्स (Massachusetts) के फेडरल कोर्ट में दायर किया जाएगा। यह इस नीति के खिलाफ तीसरी बड़ी कानूनी चुनौती होगी। इससे पहले अमेरिकी चैंबर ऑफ कॉमर्स (US Chamber of Commerce) और विभिन्न यूनियनों व धार्मिक संगठनों ने भी इस पर आपत्ति जताई थी। मुकदमे में कहा गया है कि डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) ने कांग्रेस द्वारा तय सीमा से बाहर जाकर शुल्क लगाया है और प्रशासनिक प्रक्रिया अधिनियम (Administrative Procedure Act – APA) की नोटिस-और-कमेंट प्रक्रिया को दरकिनार किया है। सामान्य तौर पर H-1B वीजा शुल्क $960 से $7,595 के बीच होता है, जबकि नया शुल्क इसे असामान्य रूप से महंगा बना देता है।

डोनाल्ड ट्रंप पर बना दबाव

प्रेस कॉन्फ्रेंस में रॉब बांटा (Rob Bonta) ने साफ कहा कि कोई भी राष्ट्रपति कानून, संविधान या कांग्रेस को नजरअंदाज नहीं कर सकता। राज्यों का तर्क है कि यह नीति सरकारी और गैर-लाभकारी संस्थानों की आवश्यक सेवाओं को सीधे प्रभावित करेगी। फिलहाल मामला अदालत में जाने के बाद कानूनी प्रक्रिया के तहत सुना जाएगा और संभव है कि इस पर अंतरिम रोक भी लगाई जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कोर्ट ने राज्यों के पक्ष में फैसला दिया, तो ट्रंप प्रशासन को नीति में बदलाव करना पड़ सकता है। वहीं, अगर सरकार को राहत मिली, तो H-1B वीजा सिस्टम में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। अब सबकी नजरें फेडरल कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं, जो अमेरिका की इमीग्रेशन नीति की दिशा तय करेगा।

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