Iran Alone In US Israel War: मध्य पूर्व में तनाव चरम पर है। अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों से ईरान बुरी तरह घिर गया है। युद्ध अब 7वें दिन में प्रवेश कर चुका है। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद शुरू हुए इस संघर्ष में ईरान ने मिसाइल और ड्रोन अटैक से जवाब दिया है, लेकिन उसके पुराने दोस्त रूस और चीन सिर्फ कड़ी निंदा और कूटनीतिक बयानों तक सीमित हैं। कोई सैन्य मदद, खासकर आर्टिलरी या हथियारों का सपोर्ट नहीं मिल रहा। ईरान अब लगभग अकेला लड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति ईरान के लिए बड़ा झटका है। आखिर रूस (पुतिन) और चीन (शी जिनपिंग) क्यों पीछे हट गए? आइए जानते हैं 4 मुख्य वजहें।
युद्ध की शुरुआत और ईरान की स्थिति/Iran Alone In US Israel War
यह युद्ध 28 फरवरी 2026 को शुरू हुआ, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले किए। इन हमलों में सुप्रीम लीडर खामेनेई समेत कई बड़े नेता मारे गए। ईरान ने जवाब में पूरे मिडिल ईस्ट में मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिससे खाड़ी देशों में हाहाकार मच गया। अब तक ईरान में 1400 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। अमेरिका-इजरायल की तरफ से ईरान के मिसाइल साइट्स, नेवी, एयर डिफेंस और न्यूक्लियर ठिकानों को निशाना बनाया जा रहा है। ईरान की स्थिति कमजोर हो रही है, क्योंकि उसके सहयोगी रूस और चीन मैदान में नहीं उतर रहे।

वजह 1: रूस सीधे जंग में नहीं कूदना चाहता
रूस और ईरान के बीच 2025 में रणनीतिक साझेदारी का समझौता हुआ था, लेकिन यह कोई सैन्य गठबंधन नहीं है। इसमें कोई बाध्यता नहीं कि रूस को ईरान की मदद करनी ही पड़े। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने साफ कहा, “ईरान ने हमसे हथियार या मदद मांगी ही नहीं।” रूस खुद यूक्रेन युद्ध में फंसा हुआ है। नया फ्रंट खोलना उसके लिए जोखिम भरा है। रूस खुद को मध्यस्थ की भूमिका में रखना चाहता है, न कि अमेरिका से सीधे टकराव में। इसलिए वह सिर्फ UN सिक्योरिटी काउंसिल में मीटिंग की मांग और निंदा तक सीमित है।
वजह 2: चीन अपने आर्थिक हितों को खतरे में नहीं डालना चाहता
चीन ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है, लेकिन उसके गल्फ देशों जैसे सऊदी अरब, UAE और अन्य से भी मजबूत व्यापारिक रिश्ते हैं। अगर चीन खुलकर ईरान का साथ देता है, तो गल्फ देश नाराज हो सकते हैं और तेल सप्लाई प्रभावित हो सकती है। चीनी एक्सपर्ट्स का कहना है कि चीन किसी भी नई ईरानी सरकार के साथ काम करने को तैयार है, बशर्ते तेल का बहाव जारी रहे। होर्मुज स्ट्रेट अगर लंबे समय बंद रहा तो चीन को मजबूरन कुछ करना पड़ सकता है, लेकिन फिलहाल वह सिर्फ कूटनीतिक बयान दे रहा है। चीन ने हमलों को “अस्वीकार्य” बताया है, लेकिन कोई सैन्य सपोर्ट नहीं दिया।
वजह 3: कोशिश है क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने की
रूस और चीन दोनों ईरान के साथ-साथ उसके विरोधियों (जैसे गल्फ देशों) से भी अच्छे रिश्ते रखना चाहते हैं। किसी एक पक्ष से पूरी तरह जुड़ जाना बाकी पार्टनर्स को नाराज कर सकता है। दोनों देश अमेरिका से सीधा वैश्विक टकराव नहीं चाहते। इसलिए वे कूटनीति, निंदा और UN में चर्चा तक सीमित रहकर संतुलन बनाए रख रहे हैं। इससे उनकी छवि “मध्यस्थ” की बनी रहती है और आर्थिक-रणनीतिक नुकसान से बचते हैं।
वजह 4: बड़ा टकराव का डर अमेरिका से
सैन्य मदद देने का मतलब अमेरिका के साथ सीधा युद्ध हो सकता है, जो दोनों देशों के लिए बहुत महंगा साबित होगा। रूस पहले से यूक्रेन में उलझा है, जबकि चीन अपनी अर्थव्यवस्था और ताइवान जैसे मुद्दों पर फोकस कर रहा है। इसलिए वे सिर्फ बयानबाजी कर रहे हैं। रूसी विदेश मंत्रालय ने कहा कि हमलों से तनाव कम होने के कोई संकेत नहीं हैं, लेकिन एक्शन नहीं लिया।
निष्कर्ष
फिलहाल ईरान अकेला ही लड़ रहा है। अगर युद्ध लंबा चला और तेल सप्लाई प्रभावित हुई, तो चीन-रूस की पॉलिसी बदल सकती है। लेकिन अभी दोनों सिर्फ बातें कर रहे हैं। यह ईरान के लिए बड़ा झटका है। क्षेत्र में तनाव बढ़ता जा रहा है और दुनिया युद्ध के विस्तार से चिंतित है। पीएम मोदी, ट्रंप और नेतन्याहू जैसे नेता भी इस संकट पर नजर बनाए हुए हैं, लेकिन ईरान की स्थिति कमजोर दिख रही है।










