Mangawan Police Station Rewa : रीवा जिले में इन दिनों पुलिस थानों की कार्यप्रणाली को लेकर खूब चर्चा हो रही है। पहले सिविल लाइन थाना सुर्खियों में रहा और अब मनगवां थाना भी लोगों की जुबान पर चढ़ गया है। स्थानीय लोग और सूत्र बता रहे हैं कि मनगवां थाना अब ‘कमाई का थाना’ कहलाने लगा है। हाईवे से लगा होने की वजह से यहां ट्रैफिक, ट्रांसपोर्ट और छोटे-मोटे मामलों में अच्छी कमाई की अफवाहें काफी पुरानी हैं। लोग कहते हैं कि इस थाने में पोस्टिंग पाने के लिए कई थाना प्रभारियों में होड़ लगी रहती है।
मनगवां थाना क्यों खास माना जाता है?

मनगवां थाना रीवा शहर से थोड़ा दूर लेकिन हाईवे पर स्थित है। यहां से गुजरने वाले ट्रकों, बसों, टैंकरों और अन्य वाहनों की वजह से ट्रैफिक पुलिसिंग का बड़ा काम होता है। चेकिंग, चालान, ओवरलोडिंग, परमिट और छोटे-मोटे विवादों में पुलिस को काफी काम मिलता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन मामलों में ‘सेटिंग’ और ‘समझौता’ से अच्छी रकम बन जाती है। इसी वजह से इसे ‘कमाई का थाना’ का नाम मिला हुआ है। कई सालों से यह चर्चा चल रही है कि यहां पोस्टिंग पाने वाले अफसर खुश रहते हैं और जल्दी-जल्दी तबादले भी नहीं मांगते।
सिविल लाइन से मनगवां का सफर, पुष्पेंद्र मिश्रा की पोस्टिंग
हाल ही में सिविल लाइन थाना प्रभारी रहे पुष्पेंद्र मिश्रा का मनगवां थाने में तबादला हो गया है। यह खबर आते ही इलाके में नई अफवाहों का सिलसिला शुरू हो गया। सिविल लाइन थाना पहले से ही विवादों में रहा है। वहां भी कुछ मामलों में जांच चल रही है। अब पुष्पेंद्र मिश्रा का मनगवां पहुंचना लोगों को हैरान कर रहा है।
सूत्रों की मानें तो इस तबादले के पीछे ‘लंबी सेटिंग’ चली थी। कुछ लोग दावा करते हैं कि अच्छी कमाई वाली पोस्टिंग के लिए आर्थिक लेन-देन भी हुआ है। हालांकि ये सारी बातें सिर्फ अफवाहों और चर्चाओं तक सीमित हैं। किसी भी आधिकारिक सूत्र ने इन दावों की पुष्टि नहीं की है। पुलिस विभाग में ऐसे मामलों पर विभागीय जांच भी चल रही है, जिसकी आंच रीवा तक पहुंच चुकी है।
ग्रामीणों का डर और खुलकर न बोल पाना
मनगवां और आसपास के गांवों में रहने वाले लोग खुलकर कुछ नहीं बोल पाते। उनका कहना है कि पुलिस थाने से जुड़ी बातें बोलने पर नौकरी, जमीन या अन्य परेशानियां हो सकती हैं। इसी वजह से ज्यादातर लोग चुप रहते हैं और बातें सिर्फ घर-घर, चाय की दुकानों और सोशल मीडिया पर ही चलती हैं। ग्रामीणों का कहना है कि थाने में जो भी होता है, उसकी सच्चाई बाहर कम ही आ पाती है।
कई बार छोटे-मोटे विवादों में लोग थाने जाते हैं, लेकिन वहां ‘समझौता’ के नाम पर पैसे मांगे जाते हैं, ऐसा आरोप लगता रहा है। हालांकि ये आरोप साबित नहीं हुए हैं, लेकिन चर्चा इतनी तेज है कि लोग अब थाने जाने से पहले सोचते हैं।
विभागीय जांच और सवाल
पुलिस विभाग में इन दिनों कई थानों पर जांच चल रही है। कुछ मामलों में सीनियर अफसरों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। रीवा जिले में सिविल लाइन से लेकर मनगवां तक की ये चर्चाएं इसी जांच से जुड़ी लग रही हैं। लोग पूछ रहे हैं कि क्या ये तबादले जांच से बचने के लिए किए जा रहे हैं या फिर सच में मेरिट पर हो रहे हैं?
अब सवाल यह है कि प्रशासन इन चर्चाओं पर क्या रुख अपनाता है? क्या कोई जांच कमेटी बनाई जाएगी? क्या थानों की कार्यप्रणाली में सुधार होगा? या फिर ये सारी बातें अफवाहें साबित होकर खत्म हो जाएंगी?
निष्कर्ष
रीवा जिले में पुलिस और जनता के बीच विश्वास बनाए रखना बहुत जरूरी है। अगर थानों पर ‘कमाई’ जैसी चर्चाएं चलती रहेंगी, तो आम आदमी का भरोसा टूटेगा। सरकार और पुलिस प्रशासन को चाहिए कि ऐसी अफवाहों पर पारदर्शिता लाए। थानों में पारदर्शी कामकाज, समय पर चालान, ऑनलाइन शिकायत सिस्टम और नियमित मॉनिटरिंग से ये चर्चाएं कम हो सकती हैं।










