जेवर एयरपोर्ट: उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर में बन रहा नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट (जेवर) अब देश का सबसे महंगा एयरपोर्ट बन गया है। यह एयरपोर्ट दिल्ली-एनसीआर के लोगों के लिए नई उम्मीद है। ट्रैफिक और दिल्ली एयरपोर्ट की भीड़ से परेशान यात्रियों को अब एक बड़ा विकल्प मिलने वाला है।
पहली फेज का काम लगभग पूरा हो चुका है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 28 मार्च 2026 को इसका उद्घाटन करने वाले हैं। लेकिन सवाल यह है कि इस एयरपोर्ट को बनाने में कितने पैसे लगे? क्या यह वाकई भारत का सबसे महंगा एयरपोर्ट है? आइए सरल भाषा में पूरी डिटेल समझते हैं।

जेवर एयरपोर्ट की कुल लागत कितनी है?
जेवर एयरपोर्ट को चार फेज में बनाया जा रहा है। पूरी परियोजना की कुल अनुमानित लागत करीब ₹29,560 करोड़ है। जब 2040 तक यह पूरी तरह तैयार हो जाएगा, तब इसमें 6 रनवे होंगे और यह एशिया के सबसे बड़े एयरपोर्ट्स में शुमार होगा।
- पहली फेज की लागत: लगभग ₹11,200 करोड़ (कुछ रिपोर्ट्स में ₹11,077 करोड़ तक बताया गया है)।
इस फेज में एक रनवे, आधुनिक टर्मिनल बिल्डिंग, कार्गो हब और बेसिक सुविधाएं शामिल हैं। - भविष्य की फेज: दूसरी, तीसरी और चौथी फेज में और ज्यादा पैसे लगेंगे। कुल मिलाकर ₹30,000 करोड़ के आसपास का निवेश होगा।
यह लागत सिर्फ एयरपोर्ट बनाने की है। इसके अलावा सड़क कनेक्टिविटी के लिए अलग से हजारों करोड़ खर्च हो रहे हैं।
दूसरे एयरपोर्ट्स से तुलना – क्यों है जेवर सबसे महंगा?
जेवर को भारत का सबसे महंगा एयरपोर्ट माना जा रहा है, खासकर कुल निवेश के लिहाज से:
- नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट: पहली फेज में करीब ₹19,650 करोड़ खर्च हुए। लेकिन आगे की फेज में और खर्च बढ़ सकता है।
- हैदराबाद एयरपोर्ट का विस्तार: लगभग ₹14,000 करोड़ का खर्च।
- दिल्ली का IGI एयरपोर्ट: पुराना है, इसलिए नई निर्माण लागत कम है, लेकिन ऑपरेशनल खर्च ज्यादा है।
जेवर की खासियत यह है कि यह पूरी तरह नया (ग्रीनफील्ड) एयरपोर्ट है और लंबे समय में 6 रनवे के साथ बहुत बड़ा होगा। इसलिए कुल लागत सबसे ऊंची है।
जेवर एयरपोर्ट की खासियतें क्या हैं?
- क्षमता: पहली फेज में सालाना 1.2 करोड़ (12 मिलियन) यात्रियों को हैंडल करने की क्षमता।
- रनवे: पहले फेज में एक 4000 मीटर लंबा रनवे। पूरा होने पर 6 रनवे।
- कार्गो: 20 लाख मीट्रिक टन कार्गो हैंडलिंग की सुविधा, जो बाद में 80 लाख तक बढ़ाई जा सकती है।
- डिजाइन: भारत का पहला जीरो एमिशन (शून्य उत्सर्जन) एयरपोर्ट बनाने की योजना। पर्यावरण के अनुकूल।
- जमीन: 1334 हेक्टेयर जमीन पर बन रहा है, जो 6 गांवों से ली गई है।
यह एयरपोर्ट न सिर्फ पैसेंजर फ्लाइट्स के लिए होगा, बल्कि कार्गो और व्यापार को भी बढ़ावा देगा।
कनेक्टिविटी और फायदे
जेवर एयरपोर्ट दिल्ली से करीब 70-80 किलोमीटर दूर है, लेकिन अच्छी सड़क कनेक्टिविटी प्लान की गई है। यमुना एक्सप्रेसवे, दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे और अन्य रोड प्रोजेक्ट्स इससे जुड़ेंगे। सरकार सड़क कनेक्टिविटी के लिए अलग से ₹3,630 करोड़ से ज्यादा मंजूर कर चुकी है।
लाभ:
- दिल्ली एयरपोर्ट की भीड़ कम होगी।
- नोएडा, ग्रेटर नोएडा, यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र के लोगों को आसानी होगी।
- नौकरियां बढ़ेंगी और आसपास का इलाका विकसित होगा।
- कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार यहां टिकट सस्ते भी हो सकते हैं।
चुनौतियां भी हैं
- यात्रियों को एयरपोर्ट पहुंचने में समय लग सकता है (टैक्सी आदि से 2000 रुपये तक खर्च हो सकता है)।
- अभी सिर्फ पहली फेज तैयार है, पूरी क्षमता 2040 में आएगी।
- जमीन अधिग्रहण को लेकर कुछ विवाद भी रहे हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार का योगदान
उत्तर प्रदेश सरकार इस प्रोजेक्ट को हवाई हब बनाने के लिए पूरी ताकत लगा रही है। 2026-27 बजट में जेवर एयरपोर्ट के लिए ₹750 करोड़ आवंटित किए गए हैं, जिसमें ज्यादातर पैसा जमीन खरीदने के लिए है। कुल सिविल एविएशन विभाग के लिए ₹2,111 करोड़ का बजट रखा गया है।
निष्कर्ष
जेवर एयरपोर्ट सिर्फ एक नया एयरपोर्ट नहीं है। यह उत्तर प्रदेश को एविएशन हब बनाने का बड़ा सपना है। दिल्ली-एनसीआर की बढ़ती आबादी और ट्रैफिक को देखते हुए यह जरूरी था।










