रायबरेली: प्रदेश में पहली बार प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाया गया है, और उन्हें प्रशासक बनाया गया है, जो चर्चा का विषय बना हुआ है। इस पर विपक्ष भी खुलकर सामने नहीं आ रहा है। सरकार की चाल बता रहा है।
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रदेश के लगभग 57 हजार ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाए जाने और उन्हें प्रशासक बनाए जाने के फैसले के बाद सियासी हलचल तेज हो गई है। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश सरकार के उद्यान मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने अपने निज आवास पर सैकड़ों ग्राम प्रधानों को आमंत्रित कर उनका स्वागत किया और सरकार के फैसले पर बधाई दी।

कार्यक्रम के दौरान पहुंचे ग्राम प्रधानों ने मंत्री दिनेश प्रताप सिंह को माला पहनाकर स्वागत किया और मुख्यमंत्री के प्रति आभार जताया। प्रधानों ने कहा कि सरकार द्वारा लिया गया यह फैसला ग्रामीण विकास और पंचायत व्यवस्था को मजबूती देने वाला है, जो 5 सालों तक काम नहीं कर पाएगा 6 महीने में ग्राम प्रधान करने का दावा कर रहे हैं।
हालांकि, इस फैसले को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी शुरू हो गई है। विपक्ष लगातार भाजपा सरकार पर निशाना साध रहा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए ग्राम प्रधानों को यह “राजनीतिक लॉलीपॉप” दिया गया है ताकि पंचायत स्तर पर भाजपा अपनी पकड़ मजबूत कर सके।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव के दौरान मंत्री दिनेश प्रताप सिंह द्वारा कुछ ग्राम प्रधानों से कई वादे किए गए थे, लेकिन अब तक वे पूरे नहीं हो सके हैं। सूत्रों के मुताबिक, कार्यक्रम में कई ऐसे प्रधान भी शामिल नहीं हुए जो पहले मंत्री के करीबी माने जाते थे। बताया जा रहा है कि करीब कई दर्जन प्रधान इस बैठक से दूरी बनाए रहे।
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा रही कि कुछ प्रधान मंत्री के समर्थन में इस उम्मीद से आए थे कि उन्हें विकास कार्यों में प्राथमिकता और अन्य लाभ मिलेंगे, लेकिन उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। प्रधानों के बीच सुविधा शुल्क और विकास कार्यों को लेकर भी नाराजगी देखने को मिली।
इसके बावजूद कार्यक्रम में मौजूद अधिकांश ग्राम प्रधानों ने सरकार के फैसले की खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि कार्यकाल बढ़ने से अधूरे विकास कार्य पूरे करने में मदद मिलेगी और पंचायतों में प्रशासनिक निरंतरता बनी रहेगी।
वहीं, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पंचायत प्रतिनिधियों को साधने की यह कवायद आने वाले 2027 विधानसभा चुनाव के लिहाज से काफी अहम मानी जा रही है। अब देखना यह होगा कि सरकार का यह फैसला राजनीतिक रूप से कितना असर डालता है और ग्रामीण राजनीति में इसका क्या संदेश जाता है।










