बकरीद पर बैंकर भदवा में दिखी भाईचारे की मिसाल, अमन और इंसानियत के संदेश के साथ मनाया गया त्योहार

झारखंड के रामगढ़ जिले के मांडू प्रखंड अंतर्गत सोनडीहा पंचायत के बैंकर भदवा गांव में गुरुवार को ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का त्योहार पूरे उत्साह और शांतिपूर्ण माहौल में मनाया गया। सुबह से ही गांव में त्योहार को लेकर रौनक देखने को मिली। मुस्लिम समुदाय के लोगों ने नमाज अदा कर देश और समाज में अमन-चैन की दुआ मांगी। इसके बाद लोगों ने एक-दूसरे को गले लगाकर बकरीद की मुबारकबाद दी।

कुर्बानी की परंपरा को निभाया गया

बकरीद को इस्लाम धर्म में कुर्बानी के त्योहार के रूप में जाना जाता है। इस मौके पर लोगों ने धार्मिक परंपराओं का पालन करते हुए बकरा और अन्य जानवरों की कुर्बानी दी। गांव के बुजुर्ग मो. महफुज अंसारी ने बताया कि इस पर्व का संबंध हजरत इब्राहिम की उस कुर्बानी से जुड़ा है, जब उन्होंने अल्लाह के हुक्म पर अपनी सबसे प्यारी चीज़ कुर्बान करने की तैयारी दिखाई थी। उनकी सच्ची नीयत को देखते हुए अल्लाह ने बेटे की जगह जानवर की कुर्बानी स्वीकार कर ली। तभी से मुस्लिम समाज में यह परंपरा चली आ रही है।

जरूरतमंदों के बीच बांटी गई खुशियां

ईद-उल-अजहा के मौके पर गांव में सिर्फ धार्मिक रस्में ही नहीं निभाई गईं, बल्कि इंसानियत और मदद का भी संदेश देखने को मिला। मिराज खान ने बताया कि कुर्बानी के बाद मांस का एक हिस्सा गरीब और जरूरतमंद लोगों के बीच बांटा गया। इसके साथ ही कई परिवारों को आर्थिक सहायता और जरूरी सामान भी दिया गया। लोगों का कहना था कि बकरीद का असली उद्देश्य सिर्फ कुर्बानी नहीं, बल्कि समाज में प्रेम, बराबरी और सहयोग की भावना को मजबूत करना है।

युवाओं ने दिया भाईचारे का संदेश

गांव के युवा भी त्योहार को लेकर काफी उत्साहित नजर आए। सोनू ने कहा कि बकरीद लोगों को आपसी भाईचारे और इंसानियत का संदेश देती है। इस मौके पर गांव में सभी समुदायों के लोगों के बीच सौहार्द का माहौल देखने को मिला। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी ने खुशी के साथ त्योहार मनाया।

शांति और सौहार्द के साथ संपन्न हुआ पर्व

पूरे दिन गांव में शांति और सौहार्द का माहौल बना रहा। स्थानीय लोगों ने बताया कि त्योहार के दौरान कहीं भी किसी प्रकार की अव्यवस्था देखने को नहीं मिली। लोगों ने एक-दूसरे के घर पहुंचकर मुबारकबाद दी और सामाजिक एकता का परिचय दिया। बैंकर भदवा में मनाया गया बकरीद का त्योहार एक बार फिर यह साबित कर गया कि त्योहार सिर्फ धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने का माध्यम भी होते हैं।

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