सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की ओर से किए गए अध्ययन में दिल्ली का विस्तृत हीट मैप तैयार किया गया। इस अध्ययन ने बताया कि शहर का बड़ा हिस्सा भीषण गर्मी और हीट-स्ट्रेस की चपेट में है।
दिल्ली का 76 फीसदी हिस्सा झेल रहा भीषण हीट-स्ट्रेस
रिपोर्ट के मुताबिक राजधानी का करीब 76 प्रतिशत क्षेत्र गंभीर हीट-स्ट्रेस की स्थिति में है। इसका मतलब है कि यहां रहने वाले लोगों पर गर्मी का असर सामान्य से कहीं ज्यादा पड़ रहा है।

हीट-स्ट्रेस केवल बढ़े हुए तापमान को नहीं दर्शाता, बल्कि इसमें गर्म हवाएं, गर्म सतहें और शरीर की गर्मी सहने की क्षमता पर पड़ने वाला दबाव भी शामिल होता है। ऐसे हालात लोगों के स्वास्थ्य के लिए जोखिम बढ़ा सकते हैं।
60 डिग्री तक पहुंचा जमीन का तापमान
अध्ययन के दौरान कई इलाकों में जमीन का तापमान 60 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया गया। सड़कें, पार्किंग स्थल, कंक्रीट की इमारतें और अन्य पक्की सतहें सूरज की गर्मी को तेजी से अपने अंदर सोख लेती हैं।
दिनभर गर्मी जमा करने के बाद ये सतहें देर तक गर्मी छोड़ती रहती हैं। यही वजह है कि कई इलाकों में रात के समय भी लोगों को गर्मी से राहत नहीं मिल पाती।
हरियाली वाले इलाके दे रहे राहत, जबकि कंक्रीट वाले क्षेत्र बन रहे ‘हॉटस्पॉट’
रिपोर्ट में पाया गया कि जिन इलाकों में पेड़-पौधे और हरित क्षेत्र अधिक हैं, वहां तापमान अपेक्षाकृत कम है। पार्क, खुले मैदान और घनी हरियाली वाले क्षेत्रों में लोगों को गर्मी का असर कुछ कम महसूस होता है।
इसके उलट जिन क्षेत्रों में कंक्रीट का फैलाव ज्यादा है और हरियाली कम है, वे इलाके गर्मी के हॉटस्पॉट बनते जा रहे हैं। ऐसे क्षेत्रों में तापमान तेजी से बढ़ रहा है और लोगों को ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
सबसे ज्यादा मार झेल रहे झुग्गी बस्तियों के लोग
अध्ययन में सामने आया कि गर्मी का सबसे ज्यादा असर झुग्गी बस्तियों और आर्थिक रूप से कमजोर तबके पर पड़ रहा है। छोटे और भीड़भाड़ वाले घर दिनभर गर्मी को अपने अंदर रोककर रखते हैं, जिससे रहने वालों को लगातार परेशानी होती है।
इन इलाकों में रहने वाले अधिकांश लोगों के पास कूलर या एयर कंडीशनर जैसी सुविधाएं नहीं होतीं। ऐसे में तेज गर्मी के दौरान हालात और कठिन हो जाते हैं।
मजदूरों और स्ट्रीट वेंडरों के लिए बढ़ा जोखिम
राजधानी में लाखों लोग ऐसे हैं जिनका काम खुले आसमान के नीचे होता है। निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मजदूर, सड़क किनारे दुकान लगाने वाले स्ट्रीट वेंडर, रिक्शा चालक और दिहाड़ी मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित वर्गों में शामिल हैं।
दिनभर धूप में काम करने के कारण इनके सामने स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ जाते हैं। लंबे समय तक गर्मी में रहने से शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और कई तरह की शारीरिक परेशानियां हो सकती हैं।
शहरीकरण बढ़ा रहा है गर्मी का संकट
विशेषज्ञों के अनुसार, तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने दिल्ली में गर्मी की समस्या को और गंभीर बना दिया है। लगातार बढ़ते निर्माण कार्य, कंक्रीट का विस्तार और हरित क्षेत्रों में कमी ने तापमान बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है।
सड़कें और इमारतें दिनभर गर्मी जमा करती हैं और फिर देर तक उसे छोड़ती रहती हैं। यही वजह है कि कई इलाकों में आसपास के क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा गर्मी दर्ज की जाती है।
हीट मैप ने उजागर की राजधानी की असमान गर्मी
सीएसई के अध्ययन में तैयार किए गए हीट मैप ने यह दिखाया कि दिल्ली की गर्मी पूरे शहर में बराबर नहीं है। कुछ इलाके अत्यधिक गर्मी से जूझ रहे हैं, जबकि कुछ क्षेत्रों में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति है।
रिपोर्ट ने यह भी उजागर किया कि गर्मी का बोझ सभी लोगों पर समान रूप से नहीं पड़ रहा। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, मजदूर और झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
गर्मी सिर्फ मौसम की नहीं, जीवन की भी चुनौती
रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ती गर्मी का असर लोगों के स्वास्थ्य, कामकाज और रोजमर्रा की जिंदगी पर साफ दिखाई दे रहा है। बच्चों, बुजुर्गों और बाहर काम करने वाले लोगों के लिए यह स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण बनती जा रही है।
अध्ययन ने राजधानी के अलग-अलग इलाकों में मौजूद तापमान के अंतर और उससे प्रभावित होने वाले वर्गों की तस्वीर को विस्तार से सामने रखा है। इससे यह स्पष्ट हुआ है कि दिल्ली की गर्मी हर किसी को एक जैसी नहीं झुलसा रही, बल्कि इसका असर इलाके और परिस्थितियों के हिसाब से अलग-अलग दिखाई दे रहा है।










