Raebareli: रायबरेली जिले में ग्रामीण सड़कों की गुणवत्ता और निर्माण कार्यों की निगरानी को लेकर उठ रहे सवालों के बीच रायबरेली से डलमऊ जाने वाले मार्ग की बदहाली ने व्यवस्था की पोल खोल दी है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत बनी सड़कें महज दो वर्षों में ही गड्ढों में तब्दील होती नजर आ रही हैं। सड़क की बदहाल स्थिति का मुद्दा रायबरेली सांसद एवं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) द्वारा दिशा की बैठक में भी उठाया जा चुका है। इसके बावजूद सड़क की हालत में अपेक्षित सुधार न होने से स्थानीय लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।
सड़क की स्थिति को लेकर स्थानीय लोगों ने सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया और जिम्मेदारों के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि करोड़ों रुपये की लागत से सड़क का निर्माण कराया गया, लेकिन निर्माण की गुणवत्ता और रखरखाव पर जिम्मेदार विभागों ने गंभीरता नहीं दिखाई। नतीजा यह है कि सड़क बनने के कुछ ही समय बाद जगह-जगह बड़े-बड़े गड्ढे उभर आए।

ग्राउंड जीरो पर दिखी सड़क की हकीकत
हिन्दी खबर के संवाददाता ने ग्राउंड जीरो पर पहुंचकर सड़क की स्थिति की पड़ताल की। मौके पर कई स्थानों पर सड़क की ऊपरी परत उखड़ी मिली, जबकि कई जगह बड़े-बड़े गड्ढे दिखाई दिए। कुछ स्थानों पर सड़क के धंसने से राहगीरों और वाहन चालकों के लिए खतरा बढ़ गया है। बारिश के बाद इन गड्ढों में पानी भरने से सड़क की वास्तविक स्थिति और भी भयावह हो जाती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस सड़क से प्रतिदिन बड़ी संख्या में ग्रामीण आवागमन करते हैं, वही सड़क अब हादसों को न्योता दे रही है। दोपहिया वाहन चालकों के लिए गड्ढे विशेष रूप से परेशानी का कारण बने हुए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क निर्माण के दौरान गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाता तो इतनी कम अवधि में सड़क की यह हालत नहीं होती।
दिशा की बैठक में उठी आवाज, फिर भी नहीं सुधरी तस्वीर
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सांसद राहुल गांधी ने दिशा की बैठक में PMGSY की पांच सड़कों की स्थिति का मुद्दा उठाया था, तब संबंधित विभागों ने इस पर कितनी गंभीरता दिखाई? बैठक में सड़क निर्माण और उनकी गुणवत्ता को लेकर सवाल उठने के बावजूद जमीनी स्तर पर स्थिति जस की तस दिखाई दे रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बैठकों में अधिकारियों के सामने समस्याएं उठाई जाती हैं, आश्वासन भी दिए जाते हैं, लेकिन सड़क पर उतरते ही व्यवस्था की तस्वीर अलग नजर आती है। ग्रामीणों का आरोप है कि जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों से शिकायतों के बावजूद स्थायी समाधान नहीं हुआ।

करोड़ों की लागत, दो साल में ही सवालों के घेरे में निर्माण
करोड़ों रुपये खर्च कर तैयार की गई सड़क का महज दो वर्षों में बदहाल हो जाना निर्माण की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आखिर सड़क निर्माण के समय मानकों की जांच किस स्तर पर हुई? निर्माण सामग्री की गुणवत्ता की जांच किसने की? सड़क की गारंटी अवधि में सामने आई खामियों के लिए जिम्मेदारी किसकी तय होगी? और सबसे अहम सवाल—सरकारी धन से बनी सड़क इतनी जल्दी कैसे धराशाई हो गई?
स्थानीय लोगों ने प्रशासन से सड़क की तकनीकी जांच कराने, निर्माण की गुणवत्ता की पड़ताल करने और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
लोगों में आक्रोश, बोले—जिम्मेदारों की तय हो जवाबदेही
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि गांवों की रोजमर्रा की जिंदगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी है। सड़क खराब होने से स्कूल जाने वाले बच्चों, मरीजों, किसानों और रोजाना सफर करने वाले लोगों को परेशानी उठानी पड़ रही है।
लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि सड़क की मरम्मत और निर्माण की गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच नहीं कराई गई तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।
अब देखना यह है कि दिशा की बैठक में उठे इस मुद्दे के बाद प्रशासन कागजी कार्रवाई तक सीमित रहता है या फिर ग्राउंड जीरो पर उतरकर सड़क की गुणवत्ता की जांच कर जिम्मेदारी भी तय करता है, क्योंकि दो साल में सड़क का इस कदर टूट जाना सिर्फ गड्ढों की कहानी नहीं, बल्कि सरकारी धन के इस्तेमाल और निर्माण की निगरानी पर बड़ा सवाल है।










