दिल्ली की कवयित्री Dr. Parul Raj की ‘अस्मिता की रक्षा’ कविता ने जगाया राष्ट्रप्रेम

नारी शक्ति, सैनिकों के बलिदान और राष्ट्रीय एकता को केंद्र में रखकर लिखी रचना, विभाजनकारी सोच पर भी किया प्रहार

नई दिल्ली: साहित्य के क्षेत्र में अपनी रचनात्मक पहचान बना रहीं दिल्ली की कवयित्री डॉ. पारुल राज (Dr. Parul Raj) की नई कविता ‘अस्मिता की रक्षा’ इन दिनों साहित्य प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। ओज और राष्ट्रभाव से भरपूर इस रचना में कवयित्री ने देश की गरिमा, नारी शक्ति, सीमाओं पर तैनात सैनिकों के त्याग और सामाजिक एकजुटता जैसे विषयों को प्रभावी ढंग से सामने रखा है। कविता की पंक्तियां पाठक और श्रोता दोनों को देश के प्रति अपने दायित्व पर विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं।

नारी शक्ति को दिया स्वाभिमान का स्वर

कविता की शुरुआत ही उस चेतावनी से होती है, जिसमें देश की अस्मिता को चुनौती मिलने पर नारी शक्ति के प्रखर रूप की कल्पना की गई है। डॉ. पारुल राज लिखती हैं—

घात जो लगाई गर, अस्मिता वतन पर,
चूड़ी वाले हाथ फिर, तेग लहराएगी।

इन पंक्तियों में पारंपरिक रूप से कोमल माने जाने वाले स्त्री स्वरूप के भीतर छिपी दृढ़ता और साहस को सामने लाया गया है। संदेश साफ है कि राष्ट्र की गरिमा पर संकट आया तो महिलाएं भी निर्णायक भूमिका निभाने से पीछे नहीं हटेंगी।

जवानों के बलिदान को बताया अमूल्य कर्ज

रचना का एक महत्वपूर्ण पक्ष सीमा पर देश की सुरक्षा में जुटे सैनिकों के प्रति सम्मान है। कवयित्री ने जवानों के त्याग को ऐसी जिम्मेदारी के रूप में देखा है, जिसका ऋण किसी एक व्यक्ति या वर्ग का नहीं, बल्कि पूरे देश का है। कविता में सैनिकों के बलिदान के संदर्भ में कहा गया है कि “तुम्हारा ये कर्ज माटी, चुका नहीं पाएगी”। यह भाव सैनिकों के प्रति कृतज्ञता और उनके बलिदान की गहराई को रेखांकित करता है।

राजनीति से ऊपर राष्ट्रीय एकता का संदेश

डॉ. पारुल राज की रचना सिर्फ सीमा और शौर्य तक सीमित नहीं रहती। कविता में समाज को बांटने वाली राजनीति पर भी सवाल उठाया गया है। ‘जनता को भिड़ाकर, राजनीति क्रीड़ा कर’ जैसे भावों के जरिए कवयित्री ने उन प्रवृत्तियों पर निशाना साधा है, जो लोगों के बीच दूरी पैदा करती हैं। इसके विपरीत वह जाति-पाति और आपसी भेद भूलकर एकजुट होने का संदेश देती हैं।

सिंह गर्जना जैसा प्रभाव छोड़ता है अंतिम भाव

कविता के अंतिम हिस्से में देशभक्ति का स्वर और अधिक तीव्र हो जाता है। रणवीरों की हुंकार और मातृभूमि के प्रति संकल्प का चित्रण रचना को ओजपूर्ण बनाता है। इसकी पंक्तियां—

माटी की सौगंध हमें, शीश भले कट जाए,
भारत की आन पर, आँच नहीं आएगी।

रचना के मूल संदेश को मजबूती देती हैं। इसमें व्यक्तिगत हित से ऊपर राष्ट्र की प्रतिष्ठा को रखने का संकल्प दिखाई देता है।

कविता बनी एकता और अस्मिता की आवाज

साहित्यिक दृष्टि से देखें तो ‘अस्मिता की रक्षा’ को केवल वीर रस की कविता मानना इसके दायरे को सीमित करना होगा। इसमें नारी सम्मान, सैनिकों के प्रति कृतज्ञता, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता—चारों भाव एक साथ दिखाई देते हैं। यही वजह है कि कविता साहित्य प्रेमियों के बीच अपनी अलग छाप छोड़ रही है। डॉ. पारुल राज की यह रचना मौजूदा दौर में देश की अस्मिता और सामाजिक एकजुटता को लेकर एक सशक्त भावनात्मक संदेश देती है।

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