Indore Central Jail: अपर सचिव के ट्रांसफर आदेश पर कोर्ट की रोक, इंदौर सेंट्रल जेल में अधीक्षक की कुर्सी खाली

Indore: 15 जून के तबादला आदेश पर 24 घंटे के भीतर स्टे, कोर्ट के फैसले के बाद न अलका सोनकर ने भोपाल जॉइन किया और न दिनेश नरगावे इंदौर पहुंचे

Indore: मध्यप्रदेश जेल विभाग का 15 जून 2026 को जारी हुआ तबादला आदेश अब चर्चा का विषय बन गया है। विभाग की ओर से जारी इस आदेश में कई अधिकारियों के तबादले किए गए थे, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा इंदौर सेंट्रल जेल की अधीक्षक अलका सोनकर और जेल मुख्यालय भोपाल में पदस्थ अधीक्षक दिनेश नरगावे के तबादले को लेकर हो रही है। मामला तब और दिलचस्प हो गया जब आदेश जारी होने के कुछ ही समय बाद कोर्ट से इस पर स्टे मिल गया। इसके बाद न तो अलका सोनकर ने भोपाल में पदभार संभाला और न ही दिनेश नरगावे इंदौर सेंट्रल जेल पहुंच सके।

क्या था तबादला आदेश?

15 जून 2026 को अपर सचिव कमल नागर के हस्ताक्षर से आदेश क्रमांक 60/1326714/2026/जेल जारी किया गया। आदेश के अनुसार भोपाल जेल मुख्यालय में पदस्थ अधीक्षक दिनेश नरगावे को केंद्रीय जेल इंदौर का नया अधीक्षक बनाया गया था। वहीं इंदौर सेंट्रल जेल की अधीक्षक अलका सोनकर का तबादला भोपाल जेल मुख्यालय कर दिया गया था।

लेकिन यह आदेश ज्यादा समय तक लागू नहीं रह सका। अलका सोनकर ने इस तबादला आदेश को अदालत में चुनौती दी और उन्हें कोर्ट से स्टे मिल गया। इसके बाद पूरा तबादला अमल में नहीं आ सका।

इंदौर सेंट्रल जेल में अधीक्षक का पद खाली

कोर्ट की रोक के बाद सबसे बड़ा असर इंदौर सेंट्रल जेल के प्रशासन पर पड़ा है। बताया जा रहा है कि यहां करीब 2500 से अधिक बंदी हैं, लेकिन स्थायी अधीक्षक के अभाव में जेल का कामकाज प्रभावित हो रहा है। वरिष्ठ स्तर के कई प्रशासनिक फैसले लंबित बताए जा रहे हैं। परोल, माफी और बंदियों की शिकायतों के निपटारे जैसे मामलों में भी देरी की स्थिति बन रही है।

सूत्रों का दावा, पहले से थी तैयारी

मामले में विभागीय सूत्रों ने कई दावे किए हैं। नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर कुछ सूत्रों का कहना है कि अलका सोनकर को तबादला आदेश की जानकारी आधिकारिक रूप से जारी होने से पहले ही मिल गई थी। उनका दावा है कि 14 जून की रात तक उन्हें संभावित आदेश की सूचना मिल चुकी थी और उसी के आधार पर कानूनी तैयारी भी पहले से कर ली गई थी।

एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से यह भी दावा किया गया कि विभाग में फाइल की गतिविधियों की जानकारी समय से पहले संबंधित लोगों तक पहुंच जाती है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

‘भीतर से मिली जानकारी’ की भी चर्चा

कुछ विभागीय सूत्रों का यह भी कहना है कि दिनेश नरगावे की इंदौर में नियुक्ति से विभाग के कुछ आंतरिक समीकरण प्रभावित हो सकते थे। इसी कारण आदेश को रोकने के लिए भीतर से ही आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराई गई। हालांकि इस संबंध में भी किसी अधिकारी की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले

सूत्रों का यह भी कहना है कि यह पहला अवसर नहीं है, जब किसी तबादला आदेश पर कोर्ट से रोक लगी हो। विभाग में पहले भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां स्थानांतरण आदेश अदालत में चुनौती दिए गए और उन पर स्टे मिल गया। इसी वजह से विभाग में ‘स्टे कल्चर’ को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।

मुख्यालय से लेकर इंदौर तक हलचल

कोर्ट से स्टे मिलने के बाद जेल मुख्यालय भोपाल और इंदौर दोनों जगह इस मामले को लेकर हलचल बनी हुई है। अधिकारियों के बीच यह चर्चा है कि जब तक अदालत का अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक इंदौर सेंट्रल जेल में स्थायी अधीक्षक की नियुक्ति को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होगी।

विभाग के कई अधिकारी मानते हैं कि इस तरह की स्थिति से प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होता है और महत्वपूर्ण निर्णय लेने में कठिनाई आती है।

अगली सुनवाई पर टिकी निगाहें

अब पूरे मामले में सभी की नजर अदालत की अगली सुनवाई पर टिकी है। यदि कोर्ट की ओर से स्टे जारी रहता है तो इंदौर सेंट्रल जेल में अधीक्षक की नियुक्ति का मामला और लंबा खिंच सकता है। वहीं यदि अदालत कोई नया आदेश देती है, तो विभाग को उसके अनुसार आगे की कार्रवाई करनी होगी।

क्या कहते हैं जानकार?

प्रशासनिक मामलों के जानकारों का कहना है कि सरकारी कर्मचारियों को अपने तबादले के खिलाफ अदालत जाने का कानूनी अधिकार है। यदि किसी आदेश पर कोर्ट रोक लगा देता है तो संबंधित विभाग को उसी के अनुसार कार्रवाई करनी होती है। ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय अदालत के आदेश के बाद ही लिया जाता है।

निष्कर्ष

मध्यप्रदेश जेल विभाग का यह तबादला आदेश अब सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं रह गया है, बल्कि कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बन चुका है। कोर्ट के स्टे के कारण इंदौर सेंट्रल जेल में अधीक्षक की नियुक्ति फिलहाल अधर में है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत की अगली सुनवाई में क्या फैसला आता है और उसके बाद विभाग इस पूरे मामले में क्या कदम उठाता है।

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