रायबरेली में परिवार रजिस्टर का मामला: पांच साल से दस्तावेज के लिए भटक रहा नागरिक

सिस्टम की सुस्ती या भ्रष्टाचार? आम आदमी को भुगतना पड़ रहा दर्द

रायबरेली : जिले में प्रशासनिक सुस्ती और भ्रष्टाचार की एक और शर्मनाक तस्वीर सामने आई है। खीरों विकासखंड के भितरी महारानीगंज के निवासी नीरज कुमार लोधी, पुत्र जगमोहन लोधी, पिछले लगभग पांच वर्षों से परिवार रजिस्टर की एक नकल प्राप्त करने के लिए भटक रहे हैं। साधारण दस्तावेज, जो सामान्य तौर पर कुछ ही दिनों में मिल जाते हैं, उनके लिए वर्षों की जद्दोजहद बन गए हैं।

दस्तावेज तो सब मौजूद, लेकिन काम नहीं हो रहा

पीड़ित नीरज कुमार लोधी का कहना है कि उसके पास लगभग सभी आवश्यक दस्तावेज मौजूद हैं। इनमें शामिल हैं:

  • राशन कार्ड
  • शौचालय का लाभ प्रमाण पत्र
  • क्षेत्र पंचायत सदस्य पद से जुड़ा प्रमाणपत्र
  • आय, जाति और निवास प्रमाण पत्र
  • केंद्र सरकार से जारी जाति प्रमाण पत्र
  • परिवार के सभी सदस्यों के जन्म प्रमाण पत्र
  • वोटर लिस्ट में नाम (ग्राम पंचायत, विधानसभा और लोकसभा)

नीरज का आरोप है कि जिलाधिकारी के निर्देश पर क्षेत्र पंचायत सदस्य का प्रमाण पत्र भी जारी हो चुका है, और खरगापुर से परिवार रजिस्टर में नाम पृथक करने की प्रक्रिया भी पूरी की जा रही है। इसके बावजूद, संबंधित विभाग लगातार टालमटोल कर रहा है और दस्तावेज उपलब्ध नहीं करवा रहा।

अधिकारियों पर गंभीर आरोप

नीरज ने साफ शब्दों में आरोप लगाया है कि जिम्मेदार अधिकारी कामचोर और भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। उन्होंने कहा:

“बिना ‘सुविधा शुल्क’ के कोई काम नहीं किया जा रहा।”

पीड़ित ने खंड विकास अधिकारी और ग्राम पंचायत अधिकारी पर सीधे-सीधे लापरवाही और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उनकी फरियाद को लगातार अनसुना किया जा रहा है और अधिकारियों द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

पांच साल की जद्दोजहद: आम आदमी की पीड़ा

नीरज कुमार लोधी ने बताया कि वह कई बार ग्राम पंचायत से लेकर ब्लॉक स्तर तक आवेदन कर चुके हैं। हर बार उन्हें केवल आश्वासन मिला, लेकिन नतीजा शून्य रहा। पांच साल से यह साधारण प्रक्रिया लंबित रहना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाता है।

सामान्य रूप से, परिवार रजिस्टर की नकल मिलने में कुछ दिन लगते हैं। लेकिन नीरज के मामले में यह लंबित रहने की स्थिति यह दिखाती है कि सिस्टम की सुस्ती या भ्रष्टाचार आम नागरिकों की जिंदगी पर कितना असर डाल सकता है।

सरकार के वादे और जमीन की हकीकत

प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बात करते हैं। लेकिन नीरज का मामला साफ दिखाता है कि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है।

क्या यही है ‘भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन’? जब एक आम व्यक्ति को अपनी पहचान साबित करने के लिए पांच साल तक संघर्ष करना पड़े, तो यह पूरी प्रणाली की विफलता को उजागर करता है।

प्रशासन की परीक्षा

नीरज ने प्रशासन से गुहार लगाई है कि उसे जल्द से जल्द परिवार रजिस्टर की नकल उपलब्ध कराई जाए और दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।

अब सवाल यह है:

  • क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी?
  • क्या पीड़ित को आखिरकार न्याय मिलेगा?
  • या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

नीरज का कहना है कि उसकी कोशिश केवल अपने अधिकार के लिए है। उनका कहना है कि अगर प्रशासन ने समय पर कार्रवाई की, तो यह अन्य लोगों के लिए चेतावनी भी बनेगी और सिस्टम में सुधार होगा।

आम जनता की प्रतिक्रिया

स्थानीय लोग भी नीरज के संघर्ष को देखकर नाराज हैं। उनका कहना है कि ऐसा होना आम जनता के लिए शर्मनाक है। छोटे और साधारण दस्तावेजों के लिए पांच साल तक भटकना किसी भी लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था के लिए चुनौती है।

एक निवासी ने कहा, “अगर प्रशासन जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई नहीं करता, तो आम नागरिकों की समस्याएं कभी खत्म नहीं होंगी। यह सिस्टम की विफलता है।”

निष्कर्ष

नीरज कुमार लोधी का मामला यह दिखाता है कि सिस्टम में सुस्ती, लापरवाही और भ्रष्टाचार आम नागरिकों की जिंदगी पर भारी पड़ता है। पांच साल का इंतजार केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे प्रशासन की परीक्षा है।

अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं—क्या सिस्टम जागेगा या एक और पीड़ित यूं ही भटकता रहेगा? जनता को न्याय की उम्मीद है, और जिम्मेदार अधिकारियों को अपनी जवाबदेही निभानी होगी।

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