Maur Serai: रामगढ़ जिले के मांडू प्रखंड अंतर्गत सोनडीहा पंचायत में रथ यात्रा के अवसर पर झारखंड की लोक संस्कृति का एक दुर्लभ और भावनात्मक दृश्य देखने को मिला। गांव की लगभग 20 नवविवाहित महिलाओं ने सदियों से चली आ रही ‘मौर सेराई’ की परंपरा को पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाया। पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाएं लोकगीत गाते हुए एक साथ कार्यक्रम स्थल तक पहुंचीं, जहां पूरे गांव का माहौल सांस्कृतिक रंगों से सराबोर हो गया।
सैकड़ों महिलाओं की मौजूदगी से बढ़ी आयोजन की भव्यता
इस पारंपरिक आयोजन में गांव की सैकड़ों महिलाएं शामिल हुईं। हर ओर लोकगीतों की गूंज और पारंपरिक रीति-रिवाजों की झलक दिखाई दी। महिलाओं ने एक कतार में खड़े होकर अपने पारंपरिक गीतों पर झूमते हुए इस आयोजन को यादगार बना दिया। ग्रामीणों का कहना है कि यह परंपरा नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का सबसे सशक्त माध्यम है।

क्या है ‘मौर सेराई’ की परंपरा?
ग्रामीण महिलाओं ने बताया कि विवाह के समय दूल्हे के सिर पर पहनाया जाने वाला मौर और चेहरे के सामने सजाया जाने वाला सेहरा शुभता, सम्मान और वैवाहिक जीवन के मंगल का प्रतीक माना जाता है। विवाह के बाद रथ यात्रा के दिन इन दोनों की विधिवत पूजा की जाती है और फिर पारंपरिक रीति से उनका विसर्जन किया जाता है। यही प्रक्रिया स्थानीय भाषा में ‘मौर सेराई’ कहलाती है।
पूजा के बाद बांटा गया पारंपरिक प्रसाद
पूजा-अर्चना पूरी होने के बाद सभी नवविवाहित महिलाओं ने अपने-अपने घरों से लाए गए पारंपरिक प्रसाद का वितरण किया। इसमें भुना हुआ चना, मटर, मक्का और अन्य देसी खाद्य सामग्री शामिल थी। ग्रामीणों ने श्रद्धा के साथ प्रसाद ग्रहण किया और आयोजन की सराहना की।
लोकगीतों और नृत्य ने बांधा समां
पूरे आयोजन के दौरान महिलाएं पारंपरिक लोकगीत गाती रहीं और सामूहिक रूप से नृत्य करती नजर आईं। उनके गीतों में वैवाहिक जीवन, परिवार की खुशहाली और लोक संस्कृति की झलक साफ दिखाई दी। ग्रामीणों का मानना है कि ऐसे आयोजन सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करते हैं।
झारखंड ही नहीं, कई राज्यों में निभाई जाती है परंपरा
ग्रामीणों के अनुसार मौर सेराई की यह परंपरा केवल झारखंड तक सीमित नहीं है। बिहार, उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में भी यह रस्म अलग-अलग स्वरूपों में निभाई जाती है। हालांकि प्रत्येक क्षेत्र में इसकी विधि और लोकगीतों में स्थानीय संस्कृति की झलक देखने को मिलती है।
नई पीढ़ी तक संस्कृति पहुंचाने का प्रयास
ग्रामीण महिलाओं ने कहा कि बदलते दौर में पारंपरिक रीति-रिवाज धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। ऐसे में मौर सेराई जैसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, संस्कृति और लोक परंपराओं से परिचित कराने का माध्यम बन रहे हैं। उनका कहना है कि इस विरासत को सहेजना हर समाज की जिम्मेदारी है।










