सोशल मीडिया के दौर में गुम हो रही है पत्रकारिता की गरिमा

उत्तर प्रदेश में पत्रकारिता आसान काम नहीं है। ये कोई दुकान नहीं जो ग्राहक आया सामान तौल के दे दिया। ये दुधारी तलवार है। अगर जरा भी असावधानी हुई तो आपको ही नहीं समाज को भी खतरा हो सकता है।

पत्रकारिता के अपने मानक हैं। कुछ नियम हैं। खासकर जब धर्म/संप्रदाय से जुड़ी ख़बर हो, तो बहुत संयम बरतना होता है। पहले प्रिंट मीडिया में नव प्रवेशी होता था, तो उनको क्या लिखना है..क्या नहीं? डेस्क पर बैठे लोग बताते थे। आगंतुक भी सीखने को लालायित रहता था…प्रिंट मीडिया में वर्षों विज्ञप्ति लिखने के बाद रिपोर्टर के तौर पर फील्ड में उतारा जाता था, लेकिन जबसे सोशल मीडिया का दौर आया है…सबकुछ बदल गया है, जिसके पास मोबाइल है… कापी पेस्ट और एआई को जानता है…वह पत्रकार का टैग लगाकर घूमने लगता है…उसे ये नहीं पता होता कि इंट्रो क्या होता है..? क्राइम रिपोर्ट लिखते समय किन का नाम उजागर करना है..किसका नहीं। हेडर, प्वाइंटर तो बाद की बात है।

मौजूदा दौर में फ़ेसबुक पर पेज बनाकर पत्रकारिता करने का ज़माना.. वेब पोर्टल हैं… इंस्ट्राग्राम है, यूट्यूब चैनल हैं…ये पब्लिक को तुरंत कनेक्ट करता है। इसमें तो और सावधानी की जरुरत है, लेकिन कोई पुख्ता मॉनिटरिंग न होने की वजह से निरंकुशता बढ़ती जा रही है। कोई भी किसी के लिए कुछ भी लिख रहा है.. अपशब्दों का प्रयोग खुलकर किया जा रहा..कोई कार्रवाई न होने से ये कोढ़ फैलता जा रहा है।

आज के दौर में पत्रकार कोई भी बन सकता है..चाहे वह अंगूठाछाप हो या सब्जी बेचने वाला, ठेला लगाने वाला, पुड़िया मुंह में भरकर इधर उधर छिड़काव करने वाला… वगैरा वगैरा! शुक्रवार की रात शहर को आग में झोंकने का जो कृत्य किया गया..वह भी नादानी के साथ गैरजिम्मेदाराना भरी पत्रकारिता का भी एक नमूना है…कुछ लोगों ने कम्युनल मामलों में जो लाइव रिपोर्टिंग कर रहे थे, उनको बहुत सावधानी बरतनी थी, जो कृत्य कथित पत्रकार ने किया, उसमें घी डालने का काम किसने किया ? धार्मिक मामलों में खुलकर नहीं लिखा जाता, ऐसा प्रेस परिषद की नियमावली कहती है..उसका लेशमात्र ध्यान नहीं रखा गया…खुलकर लिखा गया… यही नहीं आरोपित का चित्र भी वायरल किया गया…जो नियम विपरीत है…। ऐसे मामलों में बहुत संवेदनशीलता बरतने की जरूरत होती है…कुछ साथी लोगों ने नहीं की।

जिला प्रशासन ने कंट्रोल किया…वह काबिलेतारिफ हैं। कुछ लोगों ने सकारात्मक पोस्ट की वह भी उचित था..मेरा सोशल मीडिया के साथियों से अनुरोध है कि संवेदनशील मामलों में बहुत एहतियात बरतने की जरूरत होती है। आप पत्रकार बनें, अच्छी बात है पर पत्रकारिता के क्या मानक हैं…उनको भी जानने समझने की कोशिश करिए…जब तक आपके अंदर सीखने की प्रवृत्ति नहीं होगी..आप न अच्छे पत्रकार बन सकते, न अच्छे इंसान..। पत्रकारिता को खेल न समझें..ये बहुत ही जिम्मेदारी भरा कार्य है..जो समाज में आपके व्यक्तित्व का भी निर्माण करता है।

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