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शिव शिष्य परिवार के तत्त्वावधान में रांची के खेलगांव में पर्यावरण संगोष्ठी का भव्य आयोजन

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शिव शिष्य परिवार के तत्त्वावधान में आयोजित कार्यक्रम “पर्यावरण संरक्षण में हमारी सहभागिता विषयक एक दिवसीय संगोष्ठी टाना भगत स्टेडियम, खेलगांव, राची में आयोजित की गई। कार्यक्रम में उपस्थित शिव शिष्य / शिष्याओं को संबोधित करते हुए दीदी बरखा आनन्द ने कहा वन के महत्त्व से हम सभी परिचित है। अगर हम इतिहास के पन्नों को पलट कर देखेंगे, तो हम पायेंगे कि पूर्व में वनों का प्रतिशत ज्यादा था, जनसख्या कम थी, पशुओं की संख्या भी कम थी। इसलिए इसके महत्व के बारे में लोग उतना नहीं सोचते थे, लेकिन बाद में जनसंख्या वृद्धि, औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, सरचनात्मक विकास की वृद्धि के साथ-साथ वनों का विनाश होता गया, जिसका परिणाम आज हाल की घटनाओं के रूप में प्रकट हो रहा है। कहने का तात्पर्य है कि कहीं सूखा तथा कहीं बाढ़, तो कही भू स्खलन के रूप में हमारे सामने आता है। पेड-पौधे मनुष्य के लिए ही नहीं अपितु समस्त जीव-जंतुओं के लिए आवश्यक हैं। इनके अभाव में पर्यावरण सतुलन को बनाए रखना असंभव है। सामुहिक प्रयासों से ही इस महत्वपूर्ण लक्ष्य की प्राप्ति सभव है।

सगोष्ठी का शुभारंभ सकीर्तन एवं जागरण भजन से हुआ। झारखंड राज्य के विभिन्न हिस्सो से आये हुए लोगों का स्वागत राजेश कुमार कोषाध्यक्ष शिव शिष्य परिवार ने किया। शिव शिष्य परिवार के मुख्य सलाहकार अर्चित आनन्द ने कहा कि हमे वृक्षों को लगाना चाहिए। हम सभी ने मिलकर पिछले बीस वर्षों में लगभग एक करोड से ज्यादा वृक्ष लगा चुके है और निस्तर इस दिशा में हम काम कर रहे है। वायु प्रदुषण से सांस लेने में दिक्कत आती है. घुटन महसुस होती है। आँख गले और फेफडे पर इसका सर्वाधिक नकारात्मक और घातक असर पड़ता है। समस्या बहुत गभीर है। भुमिगत जल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है।

इसका एक मात्र कारण वृक्षों का कटाव है। पेड़ों की सुरक्षा के लिए इससे बेहतर कुछ भी नहीं हो सकता कि हम वृक्षों को अपना समझे अपने परिवार का हिस्सा समझे। श्री आनंद ने कहा कि हमारे गुरू शिव प्रकृति का अयन करते हैं। वे प्रकृति के पालक है. सरक्षक भी है। शिव के शिष्य अपने गुरू शिव की बनाई हुई दुनिया के साथ छेडछाड नहीं करते वरन् उसकी सुरक्षा एव संरक्षण में मनसा वाचा कर्मणा तत्पर रहते हैं। प्रोफेसर रामेश्वर मडल, अध्यक्ष, शिव शिष्य परिवार ने कहा कि शिव की शिष्यता से मन निर्मल किया जा सकता है। स्वस्थ लोग ही स्वच्छ और समृद्ध देश बना सकते हैं। दूसरी ओर श्री अभिनव आनंद सचिव शिवशिष्य परिवार ने कहा कि वृक्ष आदिकाल से ही मनुष्य के हितैषी रहे हैं। दूल हमसे कुछ न लेते हुए भी हमें बहुत कुछ देते हैं जो एक सच्चा मित्र ही कर सकता है। उन्होंने गुरु दक्षिणा पर बोलते हुए कहा कि गुरु दक्षिणा का अर्थ होता है गुरु के प्रति कृतज्ञ होना। श्रीमती निहारिका के द्वारा शिव के गुरुपद पर प्रकाश डाला गया। एक दिवसीय सगोष्ठी में झारखंड राज्य के विभिन्न क्षेत्रों से आए लगभग पाव हजार आगंतुकों द्वारा पर्यावरण संरक्षण हेतु वृक्षों को लगाने एवं उनके संरक्षण के सन्दर्भ में विचार रखे गए।

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