संभल के बेटे को मां की बीमा राशि के लिए लड़नी पड़ी कानूनी लड़ाई

पड़ोसियों की बात पर बीमा रकम रोकना पड़ा महंगा, आयोग ने दिलाया इंसाफ

उत्तर प्रदेश के संभल जिले के गांव करनपुर कास्त का यह मामला है, जहां एक बेटे को अपनी मां की बीमा राशि पाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। इस घटना ने यह सवाल भी खड़ा किया कि क्या केवल लोगों की बातों के आधार पर किसी का बीमा क्लेम रोका जा सकता है।

मां ने लिया था 10 लाख का बीमा

गांव निवासी गौतम की मां शकुन्तला जी ने अपने जीवनकाल में डाक जीवन बीमा के तहत ग्रामीण डाक जीवन सुरक्षा योजना में 8 मार्च 2022 को 10 लाख रुपये की बीमा पॉलिसी खरीदी थी। यह पॉलिसी परिवार की आर्थिक सुरक्षा को ध्यान में रखकर ली गई थी।

निधन के बाद बेटे ने किया क्लेम

19 फरवरी 2023 को शकुन्तला जी का निधन हो गया। इसके बाद उनके बेटे गौतम, जो पॉलिसी में नामित थे, ने सभी जरूरी दस्तावेज जमा कर बीमा राशि के लिए आवेदन किया। उसे उम्मीद थी कि प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसे राशि मिल जाएगी।

पड़ोसियों की बात पर खारिज हुआ क्लेम

लेकिन बीमा विभाग ने उसका दावा ठुकरा दिया। विभाग का कहना था कि शकुन्तला जी पहले से बीमार थीं और इस बात की जानकारी पॉलिसी लेते समय नहीं दी गई थी। इस दावे के समर्थन में विभाग ने पड़ोसियों के बयान पेश किए, जिनमें कहा गया कि मृतका को कोई अंदरूनी बीमारी थी।

कानूनी मदद लेने का फैसला

इस फैसले से परेशान होकर गौतम ने उपभोक्ता मामलों के विशेषज्ञ अधिवक्ता लव मोहन वार्ष्णेय से संपर्क किया। अधिवक्ता ने मामले को गंभीरता से लिया और जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई।

आयोग में हुई सुनवाई

सुनवाई के दौरान बीमा कंपनी ने अपने पक्ष में फिर वही तर्क दिए और पड़ोसियों के बयान को ही सबूत बताया। लेकिन अधिवक्ता वार्ष्णेय ने इसका कड़ा विरोध किया।

उन्होंने आयोग को बताया कि किसी व्यक्ति को बीमार साबित करने के लिए मेडिकल रिपोर्ट जरूरी होती है। केवल अनुमान या लोगों की बातों के आधार पर बीमा क्लेम खारिज करना गलत है।

आयोग ने क्या कहा?

आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माना कि बीमा कंपनी का फैसला उचित नहीं था। आयोग ने साफ कहा कि बिना किसी मेडिकल प्रमाण के केवल पड़ोसियों की बातों पर भरोसा करना सही नहीं है।

गौतम को मिला इंसाफ

आखिरकार आयोग ने गौतम के पक्ष में फैसला सुनाया। ग्रामीण डाक जीवन बीमा को आदेश दिया गया कि वह 10 लाख रुपये की बीमा राशि गौतम को अदा करे। साथ ही, परिवाद दाखिल करने की तारीख से 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देने का निर्देश दिया गया।

अतिरिक्त मुआवजा भी मिलेगा

आयोग ने यह भी आदेश दिया कि बीमा कंपनी गौतम को मानसिक कष्ट और आर्थिक नुकसान के लिए 10,000 रुपये और मुकदमे के खर्च के लिए 5,000 रुपये अलग से दे।

समय पर भुगतान नहीं तो बढ़ेगा ब्याज

आयोग ने स्पष्ट किया कि यदि दो महीने के भीतर भुगतान नहीं किया गया, तो ब्याज की दर बढ़ाकर 9 प्रतिशत वार्षिक कर दी जाएगी।

निष्कर्ष

बीमा कंपनियां बिना ठोस सबूत के किसी का दावा खारिज नहीं कर सकतीं। साथ ही यह भी साबित होता है कि अगर उपभोक्ता अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाएं, तो उन्हें न्याय जरूर मिलता है।

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