वट सावित्री व्रत 2026 कब है? जानें पूजा विधि और शुभ मुहूर्त

वट सावित्री व्रत में भूलकर भी न करें ये गलतियां

वट सावित्री व्रत 2026 हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए बहुत ही खास और पवित्र व्रत माना जाता है। यह व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या के दिन रखा जाता है। साल 2026 में वट सावित्री व्रत की तिथि अमावस्या तिथि के अनुसार तय होगी, जो आमतौर पर मई या जून के महीने में पड़ती है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए व्रत रखती हैं और वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं।

इस व्रत का धार्मिक महत्व महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस ले लिए थे, तभी से यह व्रत पति की लंबी उम्र के लिए किया जाता है।

वट सावित्री व्रत कैसे किया जाता है?

इस दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद वे नए या साफ कपड़े पहनकर वट वृक्ष के पास जाती हैं। वट वृक्ष को जल अर्पित किया जाता है और उसकी पूजा की जाती है।

पूजा के दौरान कच्चा सूत (धागा) लेकर पेड़ के चारों ओर परिक्रमा करते हुए सात बार लपेटा जाता है। साथ ही सावित्री-सत्यवान की कथा सुनी जाती है या पढ़ी जाती है। पूजा के बाद महिलाएं व्रत का पालन पूरे दिन करती हैं और कई स्थानों पर अगले दिन व्रत का पारण किया जाता है।

पूजा में किन नियमों का ध्यान रखें?

वट सावित्री व्रत में कुछ नियमों का पालन करना बहुत जरूरी माना गया है। इन नियमों का पालन करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

  1. शुद्धता का ध्यान रखें:

पूजा के दिन शरीर और मन दोनों की शुद्धता जरूरी होती है। स्नान करके साफ कपड़े पहनें और मन में सकारात्मक विचार रखें।

  1. व्रत का संकल्प लें:

पूजा शुरू करने से पहले व्रत का संकल्प जरूर लें कि आप यह व्रत अपने पति की लंबी उम्र के लिए कर रही हैं।

  1. झूठ और विवाद से बचें:

पूरे दिन किसी भी प्रकार के झगड़े, गुस्से या झूठ बोलने से बचना चाहिए। व्रत के दिन शांति बनाए रखना जरूरी है।

  1. वट वृक्ष की सही पूजा करें:

वट वृक्ष को जल, कच्चा दूध और फूल अर्पित करें। पेड़ को नुकसान न पहुंचाएं, बल्कि उसकी पूजा श्रद्धा से करें।

  1. कथा सुनना जरूरी:

सावित्री और सत्यवान की कथा सुनना या पढ़ना इस व्रत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके बिना व्रत अधूरा माना जाता है।

  1. सात परिक्रमा का नियम:

वट वृक्ष के चारों ओर कच्चे सूत से सात परिक्रमा करना अनिवार्य माना गया है। इसे शुभ और फलदायी माना जाता है।

वट सावित्री व्रत का धार्मिक लाभ

मान्यता है कि इस व्रत को करने से पति की उम्र लंबी होती है और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। इसके अलावा परिवार में समृद्धि और खुशहाली आती है। कई महिलाएं इस व्रत को पूरे श्रद्धा और आस्था के साथ हर साल निभाती हैं।

निष्कर्ष

वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि आस्था और प्रेम का प्रतीक है। यह व्रत महिलाओं के समर्पण और अपने परिवार के प्रति उनके प्यार को दर्शाता है। सही नियमों के साथ इस व्रत को करने से इसका पूर्ण फल मिलता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है।

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