समायोजन सूची से नाम हटाने के नाम पर दलाली! शिक्षा विभाग की चुप्पी से उठे सवाल, आखिर किसे बचाया जा रहा है?

रायबरेली: बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षक समायोजन प्रक्रिया को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। समायोजन सूची से नाम हटवाने के नाम पर कथित रूप से धन उगाही की कोशिश का मामला अब जिले में चर्चा का विषय बन गया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शिक्षिकाओं को एक मोबाइल नंबर से फोन कर यह कहा गया कि पैसा खर्च करने पर उनका नाम समायोजन सूची से हटाया जा सकता है, तो फिर उस मोबाइल नंबर के खिलाफ अब तक एफआईआर क्यों नहीं कराई गई?

सूत्रों के मुताबिक कई शिक्षिकाओं को एक अज्ञात व्यक्ति ने फोन कर खुद को बीएसए कार्यालय से जुड़ा बताते हुए समायोजन सूची में फेरबदल कराने का दावा किया था। आरोप है कि फोन करने वाले ने नाम हटाने के एवज में आर्थिक लेन-देन की बात भी कही। मामला सामने आने के बाद बेसिक शिक्षा विभाग ने केवल एक विज्ञप्ति जारी कर यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया कि फोन करने वाला व्यक्ति विभाग का कर्मचारी नहीं है।

लेकिन विभाग की इसी कार्रवाई ने अब कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि फोन करने वाला व्यक्ति विभाग से नहीं था, तो उसके खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कराकर कार्रवाई क्यों नहीं कराई गई? मोबाइल नंबर की जानकारी होने के बावजूद पुलिस जांच की मांग क्यों नहीं की गई? आखिर ऐसा कौन सा कारण है कि विभाग ने केवल खंडन जारी कर मामले को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश की?

शिक्षा जगत में यह चर्चा भी जोरों पर है कि कथित दलाल के तार विभाग के भीतर तक जुड़े हो सकते हैं। यही वजह है कि पूरे प्रकरण में अपेक्षित कानूनी कार्रवाई नहीं की गई। चर्चा यह भी है कि बछरावां क्षेत्र के एक शिक्षक दंपत्ति की भूमिका को लेकर भी कई तरह की बातें सामने आ रही हैं। हालांकि इन चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन मामले ने विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।

जानकारों का कहना है कि यदि शिक्षा विभाग संबंधित मोबाइल नंबर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराता तो कॉल डिटेल, लोकेशन और संबंधित व्यक्तियों की पहचान सामने आ जाती। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता कि मामला किसी बाहरी ठग का था या फिर विभाग के भीतर बैठे किसी नेटवर्क का।

अब जिले के शिक्षक और शिक्षिकाएं यह सवाल उठा रहे हैं कि जब मामला सीधे शिक्षा विभाग की साख से जुड़ा है तो फिर पारदर्शी जांच से परहेज क्यों किया जा रहा है? क्या विभाग केवल विज्ञप्ति जारी कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान रहा है या फिर किसी बड़े खुलासे के डर से कार्रवाई से बच रहा है?

फिलहाल समायोजन सूची से नाम हटाने के नाम पर कथित दलाली का यह मामला शिक्षा विभाग के लिए गले की फांस बनता जा रहा है। जब तक मोबाइल नंबर की जांच और एफआईआर जैसी ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह सवाल लगातार उठता रहेगा कि आखिर “दूध का दूध और पानी का पानी” होने से किसे डर लग रहा है?

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