Nirjala Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व माना जाता है, लेकिन निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। कल श्रद्धालु पूरे देश में निर्जला एकादशी का व्रत रखेंगे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन बिना अन्न और बिना जल ग्रहण किए भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति वर्षभर की सभी एकादशियों का व्रत नहीं रख पाता, वह केवल निर्जला एकादशी का व्रत करके सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त कर सकता है।
निर्जला एकादशी ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आती है। इस समय गर्मी अधिक होने के कारण यह व्रत काफी कठिन माना जाता है। फिर भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान विष्णु की कृपा पाने और सुख-समृद्धि की कामना से यह व्रत रखते हैं।

महाभारत काल से जुड़ी है कथा
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार निर्जला एकादशी का संबंध महाभारत काल से माना जाता है। कथा के अनुसार पांडवों में भीमसेन भोजन के बिना नहीं रह सकते थे। ऐसे में वे वर्षभर की सभी एकादशियों का व्रत नहीं कर पाते थे। तब महर्षि वेदव्यास ने उन्हें ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी के दिन निर्जला व्रत रखने की सलाह दी। कहा गया कि इस एक व्रत से सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो जाएगा। तभी से इस एकादशी को भीमसेनी या पांडव निर्जला एकादशी भी कहा जाता है।
क्या है व्रत की विधि?
निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालु सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं। पूजा में तुलसी दल, पीले फूल, फल और प्रसाद अर्पित किया जाता है। पूरे दिन भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप और भजन-कीर्तन किया जाता है।
इस व्रत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें अन्न के साथ-साथ जल का भी त्याग किया जाता है। हालांकि बुजुर्ग, बीमार व्यक्ति, गर्भवती महिलाएं या स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोग अपनी क्षमता और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार व्रत कर सकते हैं। अगले दिन द्वादशी तिथि में पूजा के बाद व्रत का पारण किया जाता है।
दान का भी है विशेष महत्व
निर्जला एकादशी के दिन दान-पुण्य करने की परंपरा भी है। मान्यता है कि इस दिन जल से भरा घड़ा, छाता, पंखा, वस्त्र, फल और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। गर्मी के मौसम को देखते हुए जरूरतमंद लोगों को पानी पिलाना और शीतल पेय पदार्थ वितरित करना भी पुण्यदायी माना जाता है।
कई स्थानों पर सामाजिक और धार्मिक संगठनों की ओर से राहगीरों के लिए प्याऊ लगाए जाते हैं। श्रद्धालु भी अपने सामर्थ्य के अनुसार सेवा कार्यों में भाग लेते हैं।
आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश
धार्मिक विद्वानों के अनुसार निर्जला एकादशी केवल उपवास का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मसंयम, अनुशासन और सेवा भावना का संदेश भी देता है। व्रत के माध्यम से व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना सीखता है और ईश्वर के प्रति श्रद्धा व्यक्त करता है। वहीं दान और सेवा के कार्य समाज में सहयोग और मानवता की भावना को मजबूत करते हैं।
आज के व्यस्त जीवन में भी बड़ी संख्या में लोग इस परंपरा को निभाते हैं। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, भजन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। श्रद्धालु परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और जीवन में सकारात्मकता की कामना के साथ भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
श्रद्धा और विश्वास का पर्व
निर्जला एकादशी को लेकर लोगों में विशेष उत्साह देखने को मिलता है। बाजारों में पूजा सामग्री, फल और धार्मिक वस्तुओं की खरीदारी बढ़ जाती है। मंदिरों को सजाया जाता है और श्रद्धालु पूजा की तैयारियों में जुट जाते हैं।










